दिवाली और पटाखों का रिश्ता: कैसे जुड़ी रोशनी के इस पर्व से आतिशबाजी की परंपरा

दिवाली का महत्व:
भारत में दिवाली (Diwali) केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता, खुशियों और उजाले का प्रतीक है। यह पर्व हर साल पूरे देश में बड़े उत्साह और भव्यता के साथ मनाया जाता है। लोग अपने घरों को दीपों से सजाते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और परिवार के साथ मिलकर इस दिन का आनंद लेते हैं। दिवाली का यह पर्व अच्छाई पर बुराई की जीत और प्रकाश की अंधकार पर विजय का प्रतीक माना जाता है।

दीपों और उत्सव की परंपरा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान राम (Lord Ram) 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, तब अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में पूरे नगर को दीयों से रोशन किया था। तभी से दीप प्रज्ज्वलन का यह पर्व मनाने की परंपरा शुरू हुई। दीये अंधकार को मिटाकर सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माने जाते हैं। यह परंपरा सदियों से भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।

दिवाली में आतिशबाजी की शुरुआत कैसे हुई:
दिवाली के साथ पटाखों (Firecrackers) का संबंध बहुत बाद में जुड़ा। इतिहासकारों के अनुसार, चीन में बारूद (Gunpowder) की खोज के बाद आतिशबाजी की परंपरा शुरू हुई थी, जो बाद में भारत आई। मध्यकाल में जब मुगल शासन का दौर था, तब दरबारों में त्योहारों और विजयों के अवसर पर आतिशबाजी की जाती थी। धीरे-धीरे यह परंपरा आम लोगों के बीच भी लोकप्रिय हो गई और दिवाली जैसे त्योहारों में इसका समावेश हो गया।

आधुनिक समय में बदलती परंपरा:
आज के समय में पटाखे दिवाली का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इसके साथ ही पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भी सामने आई है। कई जगहों पर लोग अब पर्यावरण के प्रति जागरूक होते हुए ‘ग्रीन पटाखों’ (Green Crackers) का उपयोग कर रहे हैं या फिर बिना पटाखों के ‘स्वच्छ दिवाली’ (Eco-friendly Diwali) मनाने का संकल्प ले रहे हैं।

संदेश और सीख:
दिवाली का असली अर्थ केवल रोशनी, मिठाइयों या आतिशबाजी तक सीमित नहीं है। यह पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, नफरत से प्रेम की ओर और निराशा से आशा की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। यदि इस दिवाली हम पर्यावरण और समाज के हित में सोचकर उत्सव मनाएं, तो यही इस पर्व की सच्ची भावना होगी।


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यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है।

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