दिल्ली शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को बड़ी राहत, आरोपों से हुए बरी

रिपोर्टर: अनुज कुमार

नई दिल्ली (New Delhi) स्थित राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) ने दिल्ली शराब नीति से जुड़े चर्चित सीबीआई प्रकरण में आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और विजय नायर को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) आरोपों को प्रमाणित करने में असफल रही और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किसी आपराधिक षड्यंत्र या ठोस आपराधिक मंशा का निष्कर्ष नहीं निकलता।

अदालत का विस्तृत आदेश:
इस मामले में विशेष न्यायाधीश जितेन्द्र सिंह ने आदेश पारित किया। अदालत ने टिप्पणी की कि पूरे प्रकरण में किसी समग्र साजिश या आपराधिक इरादे के स्पष्ट संकेत नहीं मिले। निर्णय में यह भी उल्लेख किया गया कि प्रस्तुत आरोपपत्र में कई ऐसी कमियां थीं, जिन्हें किसी विश्वसनीय गवाह या सुसंगत बयान से पुष्ट नहीं किया जा सका। अदालत ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक होते हैं, जो इस मामले में पर्याप्त रूप से प्रस्तुत नहीं किए गए।

सीबीआई का अगला कदम:
राउज एवेन्यू कोर्ट के इस निर्णय के बाद सीबीआई ने संकेत दिया है कि वह इस आदेश के विरुद्ध दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) में अपील दायर करेगी। कानूनी प्रक्रिया के तहत उच्च न्यायालय में इस निर्णय को चुनौती दी जा सकती है। दूसरी ओर, अरविंद केजरीवाल ने इस फैसले के संदर्भ में शाम 4 बजे प्रेस वार्ता करने की जानकारी दी है।

जेल में बिताया लंबा समय:
इस प्रकरण में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को लंबे समय तक कारावास में रहना पड़ा। अरविंद केजरीवाल को 21 मार्च 2024 को गिरफ्तार किया गया था और 13 सितंबर 2024 को उन्हें जमानत मिली। इससे पूर्व 10 मई 2024 से 1 जून 2024 तक उन्हें लोकसभा चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम राहत प्रदान की गई थी। वहीं मनीष सिसोदिया को 26 फरवरी 2023 को गिरफ्तार किया गया और वे 9 अगस्त 2024 तक निरंतर जेल में रहे। इस अवधि के दौरान उन्हें सप्ताह में एक बार अपनी पत्नी से मिलने की अनुमति दी गई, जो संबंधित एजेंसियों की निगरानी में होती थी।

कानूनी प्रक्रिया पर जोर:
अदालत के निर्णय में यह स्पष्ट किया गया कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए संदेह से परे प्रमाण आवश्यक होते हैं। न्यायालय ने उपलब्ध अभिलेखों और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय सुनाया। प्रकरण से जुड़े सभी पक्षों को कानून के तहत उपलब्ध अधिकारों के अनुसार आगे की कार्रवाई करने का अवसर है।

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