राजनीति के अपराधीकरण के बारे में तो हमने खूब सुना था कहा जाता है कि 90 के दशक में राजनीति का अपराधीकरण होना शुरू हो गया लेकिन बात 90 की दशक की नहीं है यह बात तो 2022 की है यानी 21वीं सदी की जहां अब भी अपराधी राजनीति का सहारा लेकर अपने अपराध को चमका रहे हैं, ऐसे कई आरोप है।
जब किसी परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है तो परीक्षार्थियों के ऊपर क्या बिताती है यह हमने टीवी पर कई बार देखा है। बड़े-बड़े खबरों में शब्दों के माध्यम से उनके दर्द को कई बार महसूस किया है। इतनी लगन मेहनत और संघर्षों के बाद किसी परीक्षा में बैठने के लिए परीक्षार्थी पहुंचता है, खूब पढ़ाई करता है, मां-बाप अपना जीवन लगा देते हैं अपने बच्चों को पढ़ाने में, लेकिन जब किसी बड़ी परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है तो जरा सोचिए उन परीक्षार्थियों के ऊपर क्या बितती होगी, लेकिन इसके इतर पेपर लीक करने वाले मलाई काट रहे होते हैं। एक ऐसा मामला जिसमें पेपर लीक होने की वजह से करीब 16 लाख परीक्षार्थियों की परीक्षा रद्द कर दी गई थी और पेपर लीक का आरोप जिन पर था वह 18 साल तक मलाई काटते रहे और जनप्रतिनिधि भी बन गए। अब एक अच्छी खासी सरकारी नौकरी होने के बाद भी किसी को पैसे की ऐसी लत लगे कि वह लाखों बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर अपने साम्राज्य को बनाने में लग जाए तो भला ऐसा व्यक्ति समाज के लिए कैसा काम करेगा? इसका बहुत ज्यादा विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं लगती।
जी हां रेलवे में ग्रुप डी भर्ती का प्रश्नपत्र लीक होने के मामले में लखनऊ में गैंगस्टर अदालत के विशेष न्यायाधीश पुष्कर उपाध्याय ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के मौजूदा विधायक बेदी राम और निषाद पार्टी के विधायक विपुल दुबे समेत 18 आरोपियों के खिलाफ दो अलग-अलग मामलों में आरोप तय किए हैं। यह दोनों भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी दल के विधायक हैं यानी एनडीए के विधायक हैं।

अदालत ने दोनों मामलों में अभियोजन साक्ष्य पेश करने के लिए आगामी सात अगस्त की तिथि तय की है। जबकि एक अन्य आरोपी कृष्ण कुमार यादव की मृत्यु हो जाने के कारण उसके विरुद्ध चल रही कार्यवाही को समाप्त कर दिया गया है।
पत्रावली के अनुसार ग्रुप-डी की भर्ती के मामले में की गई धांधली को लेकर 18 आरोपियों के खिलाफ दो अलग-अलग मामलों में अदालत में सुनवाई चल रही है। पहला मामला धोखाधड़ी एवं उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा अनुचित संसाधनों के निवारण अधिनियम से संबंधित है। जबकि दूसरा मामला पुलिस की ओर से गिरोह बंद अधिनियम का है। आरोपियों की ओर से दोनों ही मामलों में आरोप मुक्त किए जाने की अर्जी अदालत में दी गई जिसे अदालत ने खारिज कर दिया है।
अदालत में दोनों उन्मोचन प्रार्थना पत्रों का विरोध गिरोह बन्द अधिनियम की पैरवी कर रहे एसपीओ अल्तमश अहमद ने किया था। इसके बाद दोनों मामलों के आरोपियों के विरुद्ध आरोप तय करते हुए अदालत ने गवाही के लिए सात अगस्त की तिथि नियत की है।
पत्रावली के अनुसार इस मामले मे 26 फरवरी 2006 को एसटीएफ के अपर पुलिस अधीक्षक राजेश पांडे और उनकी टीम ने आरोपियों विपुल दुबे एवं बेदी राम, संजय श्रीवास्तव, कृष्ण कुमार, मनोज कुमार मौर्य, शैलेश कुमार सिंह, रामकृपाल सिंह, भद्रमणि त्रिपाठी, आनंद कुमार सिंह, कृष्णकांत, धर्मेंद्र कुमार, रमेश चंद्र पटेल, मोहम्मद असलम ,अवधेश सिंह, सुशील कुमार एवं अख्तर हुसैन को गिरफ्तार किया था।

गिरफ्तारी के समय पुलिस ने आरोपियों के पास से रेलवे भर्ती ग्रुप डी के 26 फरवरी 2006 की परीक्षा से संबंधित प्रश्न पत्र के अलावा कई वाहन बरामद किए थे। वर्तमान में बेदी राम उप्र के गाजीपुर जिले के जखनिया विधानसभा क्षेत्र से सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) के विधायक हैं।