मायावती पुराने नेताओं की ‘घर वापसी’ कराएंगी:भाजपा-सपा में गए नेता संपर्क में; क्या बदलेगा विपक्ष का समीकरण?

बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती आगामी राजनीतिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए संगठन को मजबूत करने की दिशा में सक्रिय नजर आ रही हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार हाल के दिनों में हुई बैठकों में उन्होंने संगठन विस्तार और पुराने प्रभावशाली नेताओं को फिर से पार्टी से जोड़ने पर विशेष जोर दिया है। माना जा रहा है कि बसपा अपने पारंपरिक वोटबैंक को मजबूत करने और आगामी चुनावों की तैयारी के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है।

सूत्रों के मुताबिक मायावती ने पार्टी के कोऑर्डिनेटरों को दो प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपी हैं। पहली, अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत जनाधार रखने वाले नेताओं को पार्टी से जोड़ना और दूसरी, पुराने नेताओं की वापसी के जरिए संगठन को नई ऊर्जा देना। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Western Uttar Pradesh), अवध (Awadh) और पूर्वांचल (Purvanchal) के कई पूर्व सांसद और विधायक बसपा के संपर्क में हैं।

पुराने नेताओं की वापसी पर फोकस:

बताया जा रहा है कि ऐसे कई नेता, जिन्हें आगामी चुनावों में टिकट मिलने को लेकर संशय है, वे बसपा के संपर्क में हैं। इनमें अधिकांश पूर्व सांसद और विधायक शामिल बताए जा रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि अगले दो से तीन महीनों में इनमें से कुछ नेता पार्टी का दामन थाम सकते हैं।

पार्टी का मानना है कि अनुभवी नेताओं की वापसी से संगठनात्मक ढांचे को मजबूती मिलेगी और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ेगा। इसी रणनीति के तहत पुराने नेताओं को फिर से सक्रिय भूमिका देने की तैयारी की जा रही है।

गठबंधन को लेकर जारी हैं अटकलें:

राजनीतिक गलियारों में बसपा और कांग्रेस (Congress) के संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं भी जारी हैं। हाल ही में कांग्रेस (Congress) के दो प्रमुख दलित नेता, बाराबंकी (Barabanki) से सांसद तनुज पुनिया और कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम, लखनऊ (Lucknow) स्थित मायावती के आवास पहुंचे थे। हालांकि दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस (Congress) के साथ गठबंधन नहीं होता है तो भी बसपा छोटे दलों के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतर सकती है।

सपा और भाजपा की बढ़ी सतर्कता:

बसपा की बढ़ती सक्रियता ने समाजवादी पार्टी (SP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) दोनों का ध्यान आकर्षित किया है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यदि बसपा दलित और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में सफल होती है तो इसका असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।

पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी (SP) के साथ रहा था। ऐसे में यदि इस वोट बैंक में बंटवारा होता है तो उसका प्रभाव चुनावी परिणामों पर दिखाई दे सकता है। वहीं बसपा की ओर से ब्राह्मण समाज तक पहुंच बढ़ाने के प्रयासों पर भी राजनीतिक दल नजर बनाए हुए हैं।

2007 के सामाजिक समीकरण पर नजर:

मायावती एक बार फिर वर्ष 2007 के सामाजिक समीकरण को दोहराने की कोशिश करती नजर आ रही हैं। उस समय बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के व्यापक समर्थन के आधार पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।

सूत्रों के अनुसार सतीश चंद्र मिश्रा को ब्राह्मण समाज के बीच सक्रिय रहने की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं उमाशंकर सिंह को क्षत्रिय समाज और विश्वनाथ पाल को अति पिछड़े वर्गों के बीच संगठन को मजबूत करने का दायित्व सौंपा गया है। इसके अलावा पार्टी के सभी कोऑर्डिनेटरों को मुस्लिम भाईचारा समितियों के गठन पर भी ध्यान देने को कहा गया है।

पुराने नेताओं की वापसी को बताया जा रहा अहम कदम:

वरिष्ठ पत्रकार सैयद कासिम के अनुसार मायावती उन नेताओं को प्राथमिकता दे रही हैं जिन्होंने वर्ष 2007 की चुनावी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनका मानना है कि ऐसे नेता पार्टी की ताकत और कमजोरियों दोनों को अच्छी तरह समझते हैं।

हाल के महीनों में जय प्रकाश सिंह और पूर्व विधायक वहाब चौधरी जैसे नेताओं की पार्टी में वापसी को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन नेताओं का अपने क्षेत्रों में प्रभाव रहा है, जिससे संगठन को लाभ मिल सकता है।

2024 से पहले कई नेताओं ने छोड़ा था साथ:

लोकसभा चुनाव 2024 से पहले बसपा के कई प्रमुख नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी। इनमें लालजी वर्मा, राम अचल राजभर और गुड्डू जमाली जैसे नाम शामिल रहे। इनमें से कई नेता बाद में अन्य राजनीतिक दलों के साथ जुड़ गए और चुनावी राजनीति में सक्रिय बने रहे।

पार्टी छोड़ने वाले कुछ नेताओं ने उस समय नेतृत्व से संवाद की कमी और टिकट वितरण में बदलाव जैसी वजहों का उल्लेख किया था। अब बसपा संगठन को फिर से मजबूत करने के लिए पुराने नेताओं और नए सामाजिक समीकरणों पर एक साथ काम करती दिखाई दे रही है।

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