Maharashtra: ठाकरे बंधुओं का आखिरी किला भी ढहा, फडणवीस के सिर बंधा जीत का सेहरा

पिछले पांच वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति में तेज़ बदलाव देखने को मिले हैं। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना (अविभाजित) के नेता उद्धव ठाकरे से हार के बाद देवेन्द्र फडणवीस ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि उनका राजनीतिक सफर समाप्त नहीं हुआ है और वे दोबारा मजबूती से लौटेंगे। समय ने इस बयान को सही साबित किया। फडणवीस न केवल लौटकर आए बल्कि एक बार फिर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। अब बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी (Brihanmumbai Municipal Corporation) में भाजपा की जीत ने इस वापसी को और मजबूत कर दिया है। इस जीत को फडणवीस की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लिए नए साल के राजनीतिक उपहार के रूप में देखा जा रहा है।

बीएमसी चुनाव के नतीजों ने मुंबई की राजनीति की दशा और दिशा दोनों बदल दी हैं। तीन दशक से अधिक समय तक जिस नगर निकाय पर ठाकरे परिवार का प्रभाव रहा, वह अब इतिहास बन गया है। यह बदलाव केवल एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में बड़े सत्ता संतुलन का संकेत है।

ठाकरे ब्रांड का अंतिम किला ढहा:
बीएमसी में भाजपा की निर्णायक जीत के साथ ठाकरे ब्रांड का आखिरी मजबूत गढ़ भी ढह गया। मुंबई में ठाकरे परिवार का लगभग तीस वर्षों का वर्चस्व समाप्त हो गया है। बीएमसी का वित्तीय वर्ष 2025-26 का वार्षिक बजट 74,427 करोड़ रुपये है, जो देश के कई राज्यों के बजट से भी अधिक माना जाता है। पिछले 28 वर्षों से इस विशाल बजट की चाबी ठाकरे परिवार के पास थी, लेकिन अब यह जिम्मेदारी भाजपा के हाथ में जाने जा रही है। इससे भाजपा को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में एक सशक्त राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित होने का अवसर मिलेगा।

वर्ष 2017 के बीएमसी चुनाव में अविभाजित शिवसेना ने 84 और भाजपा ने 82 सीटें जीती थीं, लेकिन महापौर शिवसेना का बना था। इस बार भाजपा अपने महापौर के साथ सत्ता में आने जा रही है, जिसे राजनीतिक रूप से उद्धव ठाकरे से पुराना हिसाब चुकता करने के तौर पर भी देखा जा रहा है।

फडणवीस की छवि और ट्रिपल इंजन का असर:
देवेन्द्र फडणवीस का यह महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री के रूप में तीसरा कार्यकाल है। अन्य कई नेताओं के विपरीत उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप नहीं लगे हैं और उनकी छवि एक साफ-सुथरे नेता की बनी हुई है। मुंबई के मतदाताओं में यह धारणा लंबे समय से रही है कि बीएमसी में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। ऐसे में केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार होने तथा स्वयं फडणवीस के मुख्यमंत्री होने से यह भरोसा बना कि यदि नगर निगम में भी भाजपा की सत्ता आएगी तो विकास कार्यों को गति मिलेगी। चुनाव प्रचार के दौरान फडणवीस ने भ्रष्टाचार मुक्त और ट्रिपल इंजन सरकार की बात कही थी, जिसका असर चुनाव नतीजों में साफ दिखाई दिया।

अरुण गवली परिवार को झटका:
गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली के लिए यह चुनाव निराशाजनक साबित हुआ। चुनाव परिणामों में उनकी दोनों बेटियों गीता और योगिता को हार का सामना करना पड़ा। गीता भायखला-अगिपाड़ा क्षेत्र के वार्ड 212 से चौथी बार चुनाव मैदान में उतरी थीं, लेकिन उन्हें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार से हार मिली। वहीं योगिता ने पहली बार भायखला-चिंचपोकली क्षेत्र के वार्ड 207 से चुनाव लड़ा था, जहां उन्हें भाजपा के रोहिदास लोखंडे ने पराजित किया। इसके अलावा गवली की भाभी वंदना प्रदीप गवली भी वार्ड 198 से शिवसेना के टिकट पर चुनाव हार गईं।

पुणे में चाचा-भतीजा गठजोड़ विफल:
पुणे और पिंपली चिंचवाड़ नगर निगम चुनावों में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों धड़ों का गठजोड़ भी प्रभाव नहीं दिखा सका। जब बीएमसी चुनाव में भाजपा और शिवसेना (शिंदे) ने अजित पवार की राकांपा को गठबंधन में प्राथमिकता नहीं दी, तो उन्होंने अपने चाचा शरद पवार की राकांपा के साथ हाथ मिला लिया। बारामती और पुणे क्षेत्र को दोनों नेताओं का पारंपरिक गढ़ माना जाता रहा है। इसके बावजूद परिणाम उम्मीद के विपरीत रहे।

पुणे के 165 वार्डों में दोनों राकांपा धड़े मिलकर केवल 24 सीटें जीत सके, जबकि भाजपा ने अकेले 123 सीटों पर विजय हासिल की। पिंपली चिंचवाड़ में 128 सदस्यीय निकाय में अजित पवार गुट को 37 सीटें मिलीं, जबकि शरद पवार गुट का खाता तक नहीं खुला। यहां भाजपा ने 84 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इन नतीजों से साफ हो गया कि चाचा-भतीजा का राजनीतिक प्रयोग मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सका।

भाजपा का दावा, विपक्ष को करारा जवाब:
बीएमसी समेत महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में महायुति की जीत पर भाजपा ने इसे ऐतिहासिक बताया। पार्टी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि यह परिणाम दर्शाते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा और एनडीए को जनता का निरंतर समर्थन मिल रहा है। उन्होंने महाराष्ट्र की जनता का आभार जताते हुए कहा कि नकारात्मक राजनीति करने वालों को मतदाताओं ने करारा जवाब दिया है। साथ ही उन्होंने विपक्षी गठबंधन के भविष्य पर भी सवाल उठाए।

उद्धव ठाकरे और मुस्लिम मतों का सहारा:
बीएमसी चुनाव में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे का साथ मिलने के बावजूद उद्धव ठाकरे को सत्ता नहीं मिल सकी। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने 163 सीटों पर चुनाव लड़ा और 67 सीटें जीतीं, जबकि मनसे ने 53 सीटों पर चुनाव लड़कर 10 सीटें हासिल कीं। हालांकि इस गठबंधन से मराठी मतों के बंटवारे को काफी हद तक रोका गया। कई सीटों पर उद्धव ठाकरे को मुस्लिम मतों का समर्थन मिला, जिससे उनकी पार्टी भाजपा के बाद दूसरे स्थान पर रही और एकनाथ शिंदे की शिवसेना तीसरे स्थान पर खिसक गई।

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