उत्तर प्रदेश के जनपदों में भाजपा अब अपने नेतृत्व को मजबूत करने में लगी हुई है, ढाई महीने की मशक्कत के बाद आखिरकार रविवार को भाजपा ने 70 जिलों में जिलाध्यक्ष की घोषणा कर दी। लेकिन ये आसन नहीं रहा, 28 जिलों में विरोध, गुटबाजी और नेताओं के दबाव के चलते ऐन वक्त पर चुनाव टाल दिया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी, प्रदेश चुनाव प्रभारी महेंद्रनाथ पांडेय के संसदीय क्षेत्र चंदौली और डिप्टी सीएम केशव मौर्य के गृह जनपद कौशांबी में जिलाध्यक्ष की नियुक्ति आखिर क्यों नहीं हो सकी, ये बड़ा सवाल है? बताया जा रहा है कि भाजपा ने पंचायत चुनाव 2026 और विधानसभा चुनाव 2027 के मद्देनजर लखनऊ से दिल्ली तक काफी मशक्कत के बाद यह टीम तैयार की है।
वहीँ 70 जिलाध्यक्षों में से 44 नए चेहरे हैं। 26 को दोबारा मौका दिया गया है। 69 में सिर्फ 5 महिलाएं हैं। 39 जिलाध्यक्ष सामान्य वर्ग से हैं। इनमें 20 ब्राह्मण, 10 ठाकुर, 4 वैश्य, 3 कायस्थ और दो भूमिहार हैं। जबकि, 25 ओबीसी और छह अनुसूचित जाति से हैं। पूरे यूपी को भाजपा ने 98 संगठनात्मक जिलों में विभाजित कर रखा है। जनवरी के पहले हफ्ते से ही जिलों में चुनाव प्रक्रिया जारी थी। लेकिन गुटबाजी, विरोध और नेताओं के दबाव के चलते ये कहाँ आसान था, प्रदेश चुनाव प्रभारी महेंद्रनाथ पांडेय, प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी और महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह ने काफी प्रयास किया लेकिन सभी जिलों में एक साथ जिलाध्यक्ष घोषित कराने में सफल नहीं हो सके। जानकारों की माने तो भाजपा में लंबे समय बाद ऐसा देखने को मिला है जब प्रदेश और राष्ट्रीय नेतृत्व जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के लिए एकमत नहीं हो सका।
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