बिहार में 69 लाख वोटर सूची से बाहर: सीमांचल और NDA गढ़ों में सबसे ज्यादा कटौती



मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार Election Commission (चुनाव आयोग) ने 30 सितंबर को Special Intensive Revision (SIR) की फाइनल रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में बिहार के 69.3 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं, जबकि 21.53 लाख नए वोटर जोड़े गए हैं। अब बिहार में कुल मतदाताओं की संख्या घटकर 7.42 करोड़ रह गई है। जनवरी 2025 में यह आंकड़ा 7.8 करोड़ था, यानी कुल वोटरों में 6% यानी लगभग 47.77 लाख की कमी आई है।

गोपालगंज में सबसे अधिक नाम हटे:


SIR रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा वोट गोपालगंज जिले से हटाए गए हैं। यहां 8.59% यानी करीब 2.31 लाख वोटरों के नाम डिलीट किए गए हैं। जनवरी 2025 में गोपालगंज में 20.38 लाख वोटर थे, जो अब घटकर 18.06 लाख रह गए हैं। गोपालगंज में विधानसभा की छह सीटें—बैकुंठपुर, बरौली, गोपालगंज, कुचायकोट, भोरे और हथुआ—हैं, जो सभी NDA (National Democratic Alliance) के पास हैं।

सीमांचल में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए:


सीमांचल के चार जिलों किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार और अररिया में कुल 6.97 लाख वोटरों के नाम लिस्ट से बाहर कर दिए गए हैं। इन इलाकों में मुस्लिम आबादी काफी अधिक है। किशनगंज में 68%, कटिहार में 43%, अररिया में 42%, पूर्णिया में 38% और दरभंगा में 25% मुस्लिम आबादी है। पूर्णिया जिले में 8.59% यानी 1.04 लाख वोटरों के नाम हटाए गए हैं, जबकि कटिहार में 5.39% यानी 1.19 लाख वोटर अब वोटिंग लिस्ट से बाहर हैं।

NDA के गढ़ तिरहुत में भी बड़ी कटौती:


SIR के अंतिम आंकड़ों के अनुसार Tirhut Commissionary (तिरहुत कमिश्नरी) में 5.93 लाख वोटरों के नाम हटाए गए हैं। यह इलाका NDA का पारंपरिक गढ़ माना जाता है। यहां के छह जिलों की 49 विधानसभा सीटों में से 2020 के चुनाव में 33 सीटें NDA को मिली थीं, जबकि महागठबंधन को सिर्फ 16 सीटें मिली थीं।

मिथिलांचल में NDA का दबदबा और वोटों में कमी:


मिथिलांचल क्षेत्र, जो Darbhanga Commissionary (दरभंगा कमिश्नरी) में आता है, में भी वोटरों के नामों की कटौती हुई है। यहां के तीन जिलों—दरभंगा, मधुबनी और समस्तीपुर—में कुल 30 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 2020 में NDA ने 22 सीटें जीती थीं। समस्तीपुर जिले में 5.2% यानी 1.6 लाख वोटर लिस्ट से बाहर हुए हैं। मधुबनी में 6.81% यानी 2.27 लाख वोटर हटाए गए, जबकि दरभंगा में 3% यानी लगभग 89,842 वोटरों के नाम सूची से काटे गए हैं।

पटना और मगध कमिश्नरी में भी नाम कटे:


Patna Commissionary (पटना कमिश्नरी), जो महागठबंधन का मजबूत गढ़ माना जाता है, वहां छह जिलों की 43 विधानसभा सीटें हैं। 2020 के चुनाव में महागठबंधन ने 27 और NDA ने 16 सीटें जीती थीं। SIR रिपोर्ट में पटना कमिश्नरी में 2 से 4% वोटरों के नाम हटाए गए हैं। वहीं Magadh Commissionary (मगध कमिश्नरी) के पांच जिलों में 4.66% वोटर लिस्ट से बाहर किए गए हैं। यहां 26 सीटें हैं, जिनमें से 2020 में 19 सीटें महागठबंधन ने जीती थीं।

वोटिंग प्रतिशत में मामूली बदलाव से परिणाम बदल सकते हैं:


राजनीतिक विश्लेषक संतोष कुमार के अनुसार, वोटिंग प्रतिशत में मामूली बढ़ोतरी या कमी से चुनावी नतीजों पर गहरा असर पड़ सकता है। 2020 के विधानसभा चुनाव में BJP (भारतीय जनता पार्टी) को 19.5% वोट शेयर के साथ 74 सीटें मिली थीं। JDU (Janata Dal United) को 15.4% वोट शेयर के साथ 43 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस को 9.5% वोट और 19 सीटें मिली थीं। CPI, CPM और Bhakpa (भाकपा माले) को कुल 16 सीटें और 4.25% वोट शेयर मिला था।

सैकड़ों वोटों से तय हुए कई नतीजे:


2020 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर हार-जीत का अंतर 1000 वोटों से भी कम था। हिलसा सीट पर JDU उम्मीदवार कृष्णमुरारी उर्फ प्रेम मुखिया ने RJD के अत्रि मुनि उर्फ शक्ति सिंह यादव को केवल 12 वोटों से हराया था। बरबीघा में JDU के सुदर्शन कुमार ने कांग्रेस के गजानंद शाही को 113 वोटों से मात दी। भोरे सीट पर JDU के सुनील कुमार ने भाकपा माले के जितेंद्र पासवान को 462 वोटों से हराया। इसी तरह मटिहानी, परबत्ता, बछवाड़ा, डेहरी और कुढ़नी जैसी सीटों पर भी अंतर बेहद कम था।

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं:


JDU प्रवक्ता अभिषेक झा ने कहा कि विपक्ष ने SIR को लेकर बेवजह विवाद खड़ा किया। महागठबंधन के नेताओं ने जनता को भटकाने और माहौल बिगाड़ने की कोशिश की, लेकिन अब सच सामने है।
BJP प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने कहा कि जिन लोगों ने फर्जी वोटरों के सहारे चुनाव जीता, उन्हें अब नुकसान होगा। पहले घुसपैठियों का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब सच्चाई उजागर हो रही है।
वहीं Congress (कांग्रेस) प्रवक्ता ज्ञान रंजन ने आरोप लगाया कि महागठबंधन की मजबूत सीटों पर जानबूझकर मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, खासतौर पर दलित, गरीब और अल्पसंख्यक समुदायों के।

यह रिपोर्ट आने के बाद बिहार की राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं। सभी दल इसे अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं, लेकिन एक बात साफ है—वोटर लिस्ट में यह बड़ा बदलाव आने वाले विधानसभा चुनाव के समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।

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