बांग्लादेश में नई राजनीतिक तस्वीर उभरकर सामने आई है, जहां तारिक रहमान की अगुवाई में सरकार बनने की राह साफ हो गई है। उनकी पार्टी BNP ने 299 में से 165 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। इस जीत के साथ ही देश की सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हो गई है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी BNP की सफलता पर बधाई संदेश भेजा है, जिससे दोनों देशों के बीच संभावित नए अध्याय की चर्चा शुरू हो गई है।
चुनावी नतीजों ने बदली सियासी दिशा:
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेतृत्व वाले गठबंधन को कुल 209 सीटों पर जीत मिली, जो बहुमत के आंकड़े 151 से काफी अधिक है। इस गठबंधन में BNP सहित 10 दल शामिल हैं। दूसरी ओर डॉ. शफीकुर रहमान के नेतृत्व में जमात-ए-इस्लामी के 11 दलों के गठबंधन को केवल 70 सीटें प्राप्त हुईं। जमात प्रमुख ने ढाका-15 सीट से जीत दर्ज की। जमात गठबंधन में शामिल नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) को 2 सीटें मिलीं। यह वही NCP है, जो जुलाई-अगस्त 2024 के सत्ताविरोधी छात्र आंदोलन से उभरी थी।
आवामी लीग की अनुपस्थिति में चुनाव:
यह पहला आम चुनाव रहा जिसमें शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग ने हिस्सा नहीं लिया। 12 मई 2025 को चुनाव आयोग ने पार्टी का पंजीकरण निलंबित कर दिया था, जिसके चलते वह चुनावी मैदान से बाहर रही। इस घटनाक्रम ने चुनाव को और भी महत्वपूर्ण बना दिया, क्योंकि दशकों से राजनीति के केंद्र में रही पार्टी की गैरमौजूदगी में नई शक्ति संतुलन बना।
तारिक रहमान का उदय और राजनीतिक सफर:
20 नवंबर 1965 को जन्मे तारिक रहमान, पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र हैं। 17 वर्षों के निर्वासन के बाद वे 25 दिसंबर 2025 को लंदन से लौटे। वापसी के पांच दिन बाद उनकी मां खालिदा जिया का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। इसके बाद BNP की कमान पूरी तरह उनके हाथों में आ गई। पार्टी ने चुनाव में उन्हें मुख्य चेहरा बनाया। तारिक ने ढाका-17 और बोगरा-6 सीट से चुनाव लड़ा और दोनों स्थानों पर जीत हासिल की। युवाओं और मध्यम वर्ग से संवाद स्थापित कर उन्होंने खुद को शांत, सुनने वाले और नीति-आधारित नेता के रूप में प्रस्तुत किया। राजनीतिक पुनर्प्रवेश और पारिवारिक शोक के बाद मिली सहानुभूति का भी उन्हें लाभ मिला।
भारत-बांग्लादेश संबंधों पर नई उम्मीदें:
शेख हसीना के तख्तापलट के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में गिरावट देखी गई। अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल में चीन और पाकिस्तान के साथ संबंधों में बढ़ोतरी हुई। ऐसे में नई सरकार से भारत को संबंध सुधारने की अपेक्षा है। माना जा रहा है कि BNP भारत के साथ संपर्क में रही है और दोनों देशों के बीच संवाद की संभावनाएं प्रबल हैं।
खालिदा जिया के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संवेदना व्यक्त की थी। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ढाका पहुंचे और तारिक रहमान से मुलाकात की। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली स्थित बांग्लादेश उच्चायोग जाकर शोक प्रकट किया। 13 फरवरी की सुबह प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया मंच X पर तारिक रहमान को जीत की बधाई दी।
विदेश नीति और चुनावी वादे:
BNP ने अपने घोषणा पत्र में ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ और ‘फ्रेंड यस, मास्टर नो’ के सिद्धांतों को प्रमुखता दी है। एक रैली में तारिक रहमान ने कहा कि बांग्लादेश सर्वोपरि है, जिससे स्पष्ट संकेत मिला कि वे किसी भी बाहरी प्रभाव से स्वतंत्र नीति अपनाने की बात कर रहे हैं।
चुनावी वादों में सीमा पर होने वाली घटनाओं, जबरन घुसपैठ और तस्करी के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की बात कही गई है। साथ ही तीस्ता और पद्मा जैसी साझा नदियों के जल बंटवारे में उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित करने का संकल्प भी दोहराया गया है। इसके अतिरिक्त SAARC को पुनः सक्रिय करने और ASEAN की सदस्यता हासिल करने की दिशा में प्रयास करने का वादा किया गया है।
विशेषज्ञों की राय और आगे की राह:
पूर्व भारतीय उच्चायुक्त रीवा गांगुली दास का मानना है कि पड़ोसी देश बदले नहीं जा सकते, इसलिए सहयोग आवश्यक है। भारत सरकार ने भी संकेत दिया है कि वह किसी भी निर्वाचित सरकार के साथ काम करने को तैयार है।
बांग्लादेश में भारत के पूर्व उच्चायुक्त हर्षवर्धन श्रृंगला का कहना है कि तारिक रहमान समझते हैं कि सफल नेतृत्व के लिए भारत के साथ संतुलित संबंध जरूरी हैं। वहीं Atlantic Council के साउथ एशिया सेंटर के विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के हित आपस में जुड़े हैं और नई सरकार संवाद के लिए तैयार दिखती है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि चुनावी वादों और वास्तविक नीतियों के बीच कितना सामंजस्य स्थापित हो पाता है। नई सरकार के गठन के साथ ही बांग्लादेश की विदेश नीति और क्षेत्रीय संतुलन पर दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है।
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