Video: बलिया में बुजुर्गों के लिए बना अनोखा पार्क, प्रकृति से जुड़ी अनोखी पहल!

रिपोर्टर: अमित कुमार

उत्तर प्रदेश के बलिया (Ballia) को ऐतिहासिक रूप से सबसे पहले आजाद होने वाले जनपद के रूप में जाना जाता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बलिया में पेंशनरों के लिए एक अनूठी पहल सामने आई है। यहां पेंशनरों के लिए न केवल पहला पार्क बल्कि बैठने के लिए समर्पित भवन भी बनाया गया है, जो आज आकर्षण का केंद्र बन चुका है। दूर-दराज से बुजुर्ग पेंशनर यहां पेंशन संबंधी कार्यों के लिए आते हैं और इस परिसर में प्रकृति के बीच सुकून के पल बिताते हैं। यह पहल जनपद की पहचान को एक नई दिशा देने वाली मानी जा रही है।

पेंशनरों की सुविधा का अनोखा मॉडल:
बलिया (Ballia) के कोषागार परिसर में विकसित यह व्यवस्था पेंशनरों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। यहां बैठने की उचित व्यवस्था, छायादार स्थान और शांत वातावरण उपलब्ध कराया गया है। पेंशन के लिए आने वाले बुजुर्गों का कहना है कि यह स्थान उन्हें सम्मान और सहजता का अनुभव कराता है। यह पहल देश में पेंशनरों के लिए बनाए गए शुरुआती मॉडलों में गिनी जा रही है।

प्रशासनिक सोच से बदली तस्वीर:
वरिष्ठ कोषाधिकारी बलिया आनंद दुबे (Anand Dubey) जनपद में अपनी प्रशासनिक कार्यशैली के साथ-साथ मानवीय और संवेदनशील सोच के लिए भी पहचाने जाते हैं। उनके प्रयासों से न केवल पेंशनरों के लिए भवन और पार्क का निर्माण हुआ, बल्कि पूरे परिसर को सुव्यवस्थित और हरियाली से भरपूर बनाया गया। पेंशनरों की सुविधा को प्राथमिकता देते हुए हर व्यवस्था को व्यवहारिक रूप दिया गया है।

आनंद पेंशनर उपवन बना मिसाल:
आनंद दुबे (Anand Dubey) के प्रयासों से कोषागार परिसर में “आनंद पेंशनर उपवन” का निर्माण कराया गया। यह उपवन आज पर्यावरण संरक्षण का एक सुंदर उदाहरण बन चुका है। यहां पेड़-पौधों की देखरेख नियमित रूप से की जाती है और हरियाली को संरक्षित रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उपवन में आने वाले लोग इसे केवल पार्क नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ाव का स्थान मानते हैं।

प्रकृति से जुड़ा पूरा परिवार:
आनंद दुबे (Anand Dubey) द्वारा किए गए हरित कार्यों की सराहना आमजन से लेकर कर्मचारियों तक कर रहे हैं। खास बात यह है कि प्रकृति के प्रति यह संवेदनशीलता केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके पूरे परिवार में दिखाई देती है। उनके छोटे पुत्र विराट अभिराज द्विवेदी (Virat Abhiraj Dwivedi) और पत्नी अर्चना द्विवेदी (Archana Dwivedi) भी पेड़-पौधों और हरियाली से विशेष लगाव रखते हैं। परिवार के सदस्य मिलकर पौधारोपण और संरक्षण को अपनी दिनचर्या का हिस्सा मानते हैं।

पेड़ों से भावनात्मक रिश्ता:
यह कहना गलत नहीं होगा कि यह परिवार पेड़ों को केवल हरियाली के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत साथी के रूप में देखता है। किसी पेड़ को नुकसान पहुंचता देख उन्हें वही पीड़ा होती है, जो किसी अपने के कष्ट में महसूस होती है। यही भावनात्मक जुड़ाव इस उपवन को खास बनाता है और दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी।

बलिया की ऐतिहासिक पहचान में नया अध्याय:
बलिया (Ballia) को जहां ऐतिहासिक जनपद के रूप में जाना जाता है, वहीं कोषागार परिसर में हुआ यह कार्य एक नए इतिहास की तरह देखा जा रहा है। प्रशासनिक दायित्वों के साथ सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी निभाने का यह उदाहरण जनपद की पहचान को और मजबूत करता है। पेंशनरों के लिए बना यह उपवन आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक प्रेरक मॉडल बन सकता है।

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