रिपोर्टर: जेड ए खान
अलीगढ़ में परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत कराई गई नसबंदी के बाद 64 महिलाओं के गर्भवती होने का मामला सामने आया है। शिकायतें मिलने के बाद जब स्वास्थ्य विभाग ने जांच शुरू की तो यह चौंकाने वाली स्थिति उजागर हुई। नसबंदी जैसी स्थायी मानी जाने वाली प्रक्रिया के बाद गर्भधारण होने से न सिर्फ महिलाएं परेशान हैं, बल्कि विभागीय कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। मामले सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने नियमानुसार मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
शिकायतों के बाद हुआ खुलासा:
नसबंदी के बाद गर्भधारण की शिकायतें जब लगातार विभाग तक पहुंचीं तो स्वास्थ्य अधिकारियों ने रिकॉर्ड खंगालने शुरू किए। जांच में सामने आया कि कुल 64 महिलाएं ऐसी हैं, जिनकी नसबंदी कराई गई थी, लेकिन इसके बावजूद वे गर्भवती पाई गईं। इन मामलों को गंभीर मानते हुए विभाग ने दस्तावेजों की जांच और पात्रता के आधार पर मुआवजे की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
मुआवजा प्रक्रिया की शुरुआत:
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, जिन महिलाओं के मामले नियमों के दायरे में पाए गए हैं, उनके लिए मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। नसबंदी विफल होने की स्थिति में सरकार द्वारा तय प्रावधानों के अनुसार पीड़ित महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती है। विभाग का कहना है कि सभी वैध दावों का निस्तारण नियमानुसार किया जाएगा, ताकि प्रभावित परिवारों को राहत मिल सके।
नियमों की अनदेखी बनी बाधा:
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि 8 महिलाओं के दावे नियमों का पालन न करने के कारण निरस्त कर दिए गए हैं। विभागीय नियमों के अनुसार, नसबंदी के बाद यदि गर्भधारण होता है तो इसकी सूचना 90 दिनों के भीतर स्वास्थ्य विभाग को देना अनिवार्य होता है। इन 8 मामलों में तय समयसीमा के भीतर सूचना नहीं दी गई, जिस कारण उनके दावे मान्य नहीं माने गए।
90 दिनों की समयसीमा अहम:
स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट किया है कि नसबंदी के बाद गर्भधारण की स्थिति में महिला को 90 दिनों के भीतर संबंधित विभाग को सूचित करना जरूरी है। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि समय रहते जांच कर उचित कार्रवाई की जा सके। समयसीमा का पालन न होने पर मुआवजे का दावा स्वतः कमजोर हो जाता है, जैसा कि इन मामलों में देखने को मिला।
नसबंदी के आंकड़े:
आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2024 में अलीगढ़ में कुल 6,240 महिलाओं और पुरुषों की नसबंदी कराई गई थी। वहीं वर्ष 2025 में अब तक 3,042 महिला व पुरुष नसबंदी प्रक्रिया से गुजर चुके हैं। इन आंकड़ों के बीच 64 महिलाओं का गर्भवती होना विभाग के लिए गंभीर चुनौती बनकर सामने आया है।
विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल:
नसबंदी के बाद गर्भधारण के मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था और प्रक्रिया की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े किए हैं। हालांकि विभाग का कहना है कि नसबंदी के बावजूद बहुत कम मामलों में विफलता की संभावना रहती है, लेकिन इतने मामलों का एक साथ सामने आना चिंता का विषय है। विभागीय स्तर पर अब रिकॉर्ड की दोबारा जांच और प्रक्रिया को और सख्त करने पर जोर दिया जा रहा है।
पीड़ित महिलाओं की चिंता:
नसबंदी के बाद गर्भवती हुई महिलाओं और उनके परिवारों के सामने आर्थिक और मानसिक परेशानियां खड़ी हो गई हैं। कई महिलाओं का कहना है कि उन्होंने स्थायी समाधान समझकर नसबंदी कराई थी, लेकिन इसके बावजूद गर्भधारण होने से उनका जीवन प्रभावित हुआ है। मुआवजा प्रक्रिया शुरू होने से उन्हें कुछ राहत की उम्मीद जरूर बंधी है।
आगे की कार्रवाई पर नजर:
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि सभी मामलों की जांच पूरी पारदर्शिता के साथ की जा रही है। जिन दावों में नियमों का पालन किया गया है, उन्हें मुआवजा दिया जाएगा और भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा। साथ ही लोगों को नियमों और समयसीमा के बारे में जागरूक करने पर भी जोर दिया जाएगा।
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