80वां स्वतंत्रता दिवस: आजादी से एक रात पहले क्या हो रहा था, 14 अगस्त 1947 को कैसे तैयार हुआ नया भारत?

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14 अगस्त 1947 भारत के इतिहास का वह दिन था, जब देश ब्रिटिश शासन से आजादी हासिल करने से कुछ ही घंटे दूर था। यह दिन केवल 15 अगस्त का इंतजार करने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसी दौरान स्वतंत्र भारत की पहली सरकार का ढांचा तैयार हो चुका था। नेताओं के बीच मंत्रालयों और विभागों की जिम्मेदारियां तय की जा चुकी थीं। दूसरी ओर, संविधान सभा अपने ऐतिहासिक मध्यरात्रि सत्र की तैयारियों में जुटी थी। इसी ऐतिहासिक रात जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) ने संविधान सभा में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया और स्वतंत्र भारत के सामने मौजूद जिम्मेदारियों को सामने रखा।

14 अगस्त 1947 क्यों था ऐतिहासिक:

14 अगस्त को भारत की स्वतंत्रता में केवल कुछ घंटे बाकी थे। ब्रिटिश शासन से सत्ता भारतीय नेतृत्व को मिलने वाली थी और इसके लिए नई सरकार की व्यवस्था तैयार की जा रही थी। अलग-अलग मंत्रालयों की जिम्मेदारियां तय हो चुकी थीं और स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था आकार ले रही थी।

इसी के साथ संविधान सभा की उस विशेष बैठक की तैयारियां चल रही थीं, जो भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण बैठकों में शामिल होने वाली थी। इस बैठक के जरिए स्वतंत्र भारत की शुरुआत को औपचारिक रूप दिया जाना था।

पहली कैबिनेट में नेताओं को मिली जिम्मेदारी:

15 अगस्त से काम करने वाली स्वतंत्र भारत की पहली कैबिनेट में अलग-अलग नेताओं को महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए थे। 14 अगस्त से जुड़े दस्तावेज में प्रधानमंत्री और मंत्रियों के नाम के साथ उनके विभागों की जिम्मेदारियां दर्ज थीं।

जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) प्रधानमंत्री थे। उनके पास विदेश मामले, कॉमनवेल्थ संबंध और वैज्ञानिक अनुसंधान की जिम्मेदारी थी। वहीं सरदार वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) को गृह, सूचना एवं प्रसारण तथा रियासतों से जुड़े विभाग दिए गए थे।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad) को खाद्य एवं कृषि विभाग की जिम्मेदारी मिली थी, जबकि मौलाना अबुल कलाम आजाद (Maulana Abul Kalam Azad) को शिक्षा विभाग सौंपा गया था। डॉ. जॉन मथाई (Dr. John Matthai) के पास रेलवे एवं परिवहन और सरदार बलदेव सिंह (Sardar Baldev Singh) के पास रक्षा विभाग था।

जगजीवन राम (Jagjivan Ram) को श्रम विभाग की जिम्मेदारी दी गई थी। सीएच भाभा (C.H. Bhabha) के पास वाणिज्य और रफी अहमद किदवई (Rafi Ahmed Kidwai) के पास संचार विभाग था। राजकुमारी अमृत कौर (Rajkumari Amrit Kaur) को स्वास्थ्य तथा डॉ. बीआर आंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar) को कानून विभाग दिया गया था।

आरके षणमुखम चेट्टी (R.K. Shanmukham Chetty) के पास वित्त, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (Dr. Syama Prasad Mukherjee) के पास उद्योग एवं आपूर्ति और एनवी गाडगिल (N.V. Gadgil) के पास कार्य, खान एवं बिजली विभाग की जिम्मेदारी थी।

इस तरह स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में गृह, रक्षा, वित्त, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, परिवहन और संचार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की जिम्मेदारियां अलग-अलग नेताओं को सौंप दी गई थीं।

नई सरकार का गठन पहले से था तय:

स्वतंत्र भारत की नई सरकार अचानक तैयार नहीं हुई थी। इसके गठन की प्रक्रिया पहले से चल रही थी। 4 अगस्त को जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) ने लॉर्ड माउंटबेटन (Lord Mountbatten) को नई कैबिनेट के सदस्यों के नाम भेजे थे। उस समय अंतिम रूप से विभागों के बंटवारे का फैसला कैबिनेट की पहली बैठक में किए जाने की बात कही गई थी।

इससे स्पष्ट था कि सत्ता हस्तांतरण के साथ ही भारत को अपनी नई सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ आगे बढ़ना था।

मध्यरात्रि में संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र:

14 अगस्त की मध्यरात्रि में संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र आयोजित हुआ। इसी बैठक में भारत की स्वतंत्रता के ऐतिहासिक क्षण को औपचारिक रूप से दर्ज किया गया। इसी दौरान जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) ने अपना प्रसिद्ध ट्रिस्ट विद डेस्टिनी भाषण दिया।

नेहरू ने इस ऐतिहासिक क्षण को भारत और उसकी नियति के बीच लंबे समय से किए गए वादे के पूरा होने के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जब दुनिया का बड़ा हिस्सा सो रहा होगा, तब भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा।

उनके भाषण में आजादी की खुशी के साथ स्वतंत्र भारत की जिम्मेदारियों का भी उल्लेख था। उन्होंने देश की सेवा को करोड़ों लोगों की सेवा से जोड़ा और गरीबी, अज्ञानता, बीमारी तथा अवसरों की असमानता से जूझ रहे लोगों की स्थिति सुधारने की जिम्मेदारी पर जोर दिया।

आजादी के बाद असली जिम्मेदारी शुरू होने का संदेश:

जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) के भाषण में यह संदेश भी था कि स्वतंत्रता केवल सत्ता हासिल करने का नाम नहीं है। आजादी के बाद देश के सामने उन सपनों को वास्तविकता में बदलने की जिम्मेदारी थी, जिनके लिए स्वतंत्रता आंदोलन लड़ा गया था।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत के सपने केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। दुनिया के देश एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और शांति, स्वतंत्रता तथा समृद्धि भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

नेहरू ने देशवासियों से विश्वास और आत्मविश्वास के साथ इस नए सफर में शामिल होने की अपील की। उन्होंने छोटे विवादों और दुर्भावना से ऊपर उठकर स्वतंत्र भारत के निर्माण पर ध्यान देने का संदेश दिया।

स्वतंत्रता के साथ सेवा का लिया गया संकल्प:

मध्यरात्रि के ऐतिहासिक सत्र में स्वतंत्रता के साथ देश और जनता की सेवा का संकल्प भी जुड़ा था। जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) ने प्रस्ताव रखा कि आधी रात के बाद संविधान सभा में मौजूद सदस्य भारत और उसके लोगों की सेवा के लिए खुद को समर्पित करने की शपथ लें।

इस संकल्प में भारत को दुनिया में उसका उचित स्थान दिलाने और विश्व शांति तथा मानव कल्याण में योगदान देने की प्रतिबद्धता भी शामिल थी। यानी आजादी के साथ देश के सामने सेवा, विकास और जिम्मेदारी का नया अध्याय भी शुरू हो रहा था।

गीत को लेकर भी हुई थी चर्चा:

14 अगस्त की रात की तैयारियों से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू संविधान सभा में गीत गाए जाने को लेकर हुई चर्चा भी थी। जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) ने इस विषय पर संविधान सभा के अध्यक्ष को लिखा था कि ऐसे अवसरों पर गायन सामान्य प्रक्रिया नहीं है।

उस समय भारत का कोई आधिकारिक राष्ट्रगान भी नहीं था। इसलिए नेहरू 14 अगस्त की रात या 15 अगस्त की सुबह संविधान सभा में गीत गाए जाने को लेकर सहज नहीं थे। हालांकि उन्होंने माना कि आधी रात का सत्र असाधारण था और इसलिए कुछ अलग किए जाने पर विचार हो सकता था। इस विषय पर कांग्रेस की बैठक में भी चर्चा हुई और अंतिम निर्णय संविधान सभा के अध्यक्ष पर छोड़ दिया गया।

राष्ट्रीय ध्वज बना नए भारत की पहचान:

आजादी के साथ भारत को अपनी राष्ट्रीय पहचान भी मिल रही थी। राष्ट्रीय ध्वज को लेकर स्वतंत्रता से पहले संविधान सभा में चर्चा और निर्णय की प्रक्रिया चली थी। दस्तावेजों में राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ी चर्चा 22 जुलाई 1947 को दर्ज है।

ध्वज में मौजूद चक्र की प्रतीकात्मकता को भी समझाया गया था। इस तरह राष्ट्रीय ध्वज नए भारत के अतीत और भविष्य को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में सामने आया।

ब्रिटिश सेना की वापसी भी बनी बदलाव का हिस्सा:

राजनीतिक सत्ता के हस्तांतरण के साथ ब्रिटिश सेना की भारत से वापसी भी महत्वपूर्ण थी। जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) ने ब्रिटिश सैनिकों की वापसी को पुराने औपनिवेशिक संबंधों के अंत का प्रतीक माना था।

उनके अनुसार किसी देश में विदेशी सेना की मौजूदगी विदेशी शासन का स्पष्ट प्रतीक होती है। इसलिए ब्रिटिश सेना की वापसी भारत की स्वतंत्रता के व्यावहारिक और प्रतीकात्मक दोनों पहलुओं से जुड़ी थी। हालांकि ब्रिटिश सैनिकों की पहली टुकड़ी 17 अगस्त 1947 को बॉम्बे से रवाना हुई।

आर्थिक व्यवस्था संभालने की भी थी तैयारी:

आजादी के साथ भारत को अपनी आर्थिक व्यवस्था भी संभालनी थी। सत्ता हस्तांतरण के दौरान भारत और ब्रिटेन के बीच वित्तीय मुद्दों पर बातचीत चल रही थी। स्टर्लिंग बैलेंस से जुड़े समझौते में भारत के मौजूदा बैलेंस से 3.5 करोड़ पाउंड की राशि को 31 दिसंबर 1947 तक किसी भी मुद्रा क्षेत्र में खर्च करने के लिए उपलब्ध कराने पर सहमति बनी थी।

इसके अलावा भारतीय रिजर्व बैंक के पास 3 करोड़ पाउंड का कार्यशील बैलेंस रहने वाला था। इससे पता चलता है कि राजनीतिक सत्ता हस्तांतरण के साथ आर्थिक व्यवस्था को संभालने की तैयारी भी चल रही थी।

रियासतों को नई व्यवस्था से जोड़ना था चुनौती:

आजादी के समय भारत के सामने रियासतों का भविष्य भी एक बड़ी चुनौती थी। स्वतंत्र भारत को केवल ब्रिटिश भारत की सत्ता नहीं संभालनी थी, बल्कि रियासतों को भी नई राजनीतिक व्यवस्था से जोड़ना था।

जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) से जुड़े दस्तावेजों में रियासतों और संविधान सभा के संबंध तथा उनके भविष्य को लेकर चर्चा दर्ज है। स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर सरकार के गठन के साथ राजनीतिक एकीकरण भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी।

14 अगस्त 1947 की रात भारत के लिए केवल आजादी की पूर्व संध्या नहीं थी। इसी दौरान नई सरकार की रूपरेखा, मंत्रालयों की जिम्मेदारियां, संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र, स्वतंत्रता का संकल्प और देश के भविष्य की दिशा तय हो रही थी। आधी रात को भारत आजाद हुआ, लेकिन उसी क्षण यह जिम्मेदारी भी तय हो गई कि अब देश को अपनी सरकार खुद चलानी है और अपने भविष्य का निर्माण खुद करना है।

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