गाजीपुर | जनपद में मोहर्रम के अवसर पर कुल 763 ताजिया निकलती हैं। इस वर्ष भी मोहर्रम पर जगह जगह ताजिया निकली गयी, इस दौरान गंगा जमुनी तहजीब भी देखने को मिली तो वहीँ एतेहासिक ताजिया भी निकाली गयी। जिले के उत्तरी छोर पर स्थित बाराचवर ब्लाॅक का मांटा गांव गांव गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है। जहां सात दशक पहले शांति व्यवस्था के लिए अधिकारियों की ओर से दिया गया निर्देश आज परंपरा बन गई है।
खबर के अनुसार यहाँ मुहर्रम के नवीं रात हिंदुओं की ओर से राम-जानकी मंदिर में रात 10 बजे तक होली के गीत गाते हुए खुशियां मनाई जाती हैं। वहीं मुस्लिम पक्ष ताजियों को चौक पर रखकर मातम करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। बताया जाता है कि आज से 70 वर्ष पहले होली और मुहर्रम की नवीं यानी कत्ल की रात एक साथ पड़ी थी। दोनों पक्षों में काफी तनातनी और विवाद गहरा गया था। दोनों पक्षों की मर्यादाओं को बचाते हुए तत्कालीन प्रशासन ने व्यवस्था दी थी कि आज से कभी भी दोनों पक्ष आपस में टकराव से बचेंगे और अपना अपना त्योहार सकुशल संपन्न कराएंगे। इसी समझौते के तहत हिंदू वर्ग को रात के 10 बजे तक राम जानकी मंदिर (ठाकुर जी) पर होली गीत गाने की इजाजत दी गई और मुस्लिम वर्ग को उसके बाद चौक पर ताजिया रखकर मातम मनाते हुए परंपराओं को करने का समय दिया गया। यह समय मुहर्रम के नवीं रात के लिए ही निर्धारित किया गया है।

बाराचवर ब्लाॅक का मांटा गांव की झलक 
लोगों का कहना है कि उस समय प्रशासन की तरफ से लिए गए फैसले को परंपरा के रूप में अपनाते हुए दोनों वर्ग आज तक निभाते चले आ रहे हैं। हिंदू पक्ष रात 10 बजे तक होली के गीत गाकर खुशियां मनाता है तो मुस्लिम वर्ग उसके बाद अपनी ताजियों को लाकर इमामबाड़ा स्थित चौक पर रखकर मातम करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करता है। इस खास दिन का गांव के लोग बेसब्री से इंतजार भी करते हैं। बताया जा रहा है कि इस बात का उल्लेख बरेसर थाने के त्योहार रजिस्टर में भी दर्ज है।
वहीँ गाजीपुर शहर के मछली बाजार मोहल्ले की ताजिया विशेष महत्व रखती है। यह ताजिया 1888 में मुगल शासन काल में शुरू हुई थी। कुछ घटनाओं के कारण यह ताजिया 32 साल तक बंद रही। 2003 से यह फिर से निरंतर निकल रही है। यह जनपद में सबसे पहले अंग्रेजों के नियमानुसार दफन की जाती है।
अंग्रेजों के समय में इस ताजिया के मार्ग पर कई आपराधिक घटनाएं होती थीं। एक ही सड़क पर कई मोहल्लों की ताजिया निकलने से यह समस्या होती थी। इसलिए अंग्रेजों ने तीनों ताजियाओं के लिए अलग-अलग रास्ते तय किए। यह धार्मिक कार्यक्रम करते हुए इमामबाड़े पहुंचती है। इसके साथ दुल दुल का घोड़ा भी चलता है, जिसका मोहर्रम में विशेष महत्व है। कार्यक्रम के आयोजक डॉक्टर आजम के अनुसार, 2003 से वे इस ऐतिहासिक ताजिया को निकालने और दफन करने की व्यवस्था देख रहे हैं।
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