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Special Story: वर्ष 2025, दावा किया गया था कि 144 वर्षों बाद सामने अमृत से भरपूर नदियों का वो संगम, जिसपर पहला अधिकार विशाल साम्राज्य के मंत्रियों, अधिकारीयों और व्यापारियों का था। स्वयं विशाल साम्राज्य के वर्तमान शासक भी पधारें सामने पावन अमृत और गोते लगाने को बेकरार प्रजा, रास्तें कई थें, लेकिन अनुमति केवल एक पथ पर चलने की थी। जन जन तक सूचनाओं का प्रसार हो रहा था कि सुरक्षा और व्यवस्था का बेहतर प्रबंध किया गया है, विश्वास के समुंदर से पवित्र जनमानस, विचारधाराओं से प्रेरित होकर अमृत संगम में पुन्य की प्राप्ति को बेकरार था, दवाब बढ़ता गया और सब्र का बाँध टूट गया। सनातन के संस्कार को अन्धकार में धकेल, ज्ञान के भण्डार पर माया को हावी कर स्वार्थ का भवसागर उमड़ पड़ा, अब चाहे कोई हत्यारा कहे या बेचारा, पैरों तले धरती में लिपटे जिव जंतु हो या मानस, रौंदना ही विकल्प था क्योंकि स्वार्थ ने पुन्य का रास्ता खोला था। कहीं पुन्य प्राप्ति का त्यौहार था, कहीं एकांत में खों चूँकि पुन्य आत्माएं चिहाड़े मार रहीं थी। जयकारों में मातम का शोर छुप गया और दिन गुजरते ही भीड़ का जोर बढ़ गया था।
पूरब की तरफ वाले राज्य की जनता बेताब थी, रेलगाड़ी में सवार थी, जो सवार न हो सके वो हिंसा की अग्नि में तप रहे थे, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की मर्यादाओं से निर्मित इस पवित्र धरा पर माया के प्रकोप ने मानवता की भावना को जलाकर भाप बना दिया था, रेलगाड़ी के कांच वाली खिड़की पर पथ्थरों की बौछार शुरू हो गयी, लाठियों से खिड़की को तोड़ते एक तरफ का मानस, रेलगाड़ी में सवार मानस को धकलने लगा, क्या नारी और क्या मासूम? मानवता पर माया सवार थी।
तभी विशाल साम्राज्य की राजधानी में पुण्य प्राप्ति का प्रण लिए, जनमानस रेलगाड़ी में सवार होने को बेकरार था, रेलगाड़ी के मंच के बदलाव पर सुचना का पञ्च लग गया… बंद सीढ़ियां, एस्केलेटर, रेलवे स्टेशन के मंच पर मौजूद भीड़ और वहां हर एक सांस के लिए हांफते लोग…। जब तक हालात कुछ संभले, तब तक कई मानस ने अपने देह को त्याग दिया, जबकि कई जख्मी हो गए। इसके बाद शुरू हुआ सिसकियों का सफर।
सनातन को मानने वाले भारत में भगौलिक स्थिति के अनुसार ईश्वर की उपासना अलग अलग रूप और रिवाजों से करते हैं, पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण में मान्यताएं बदल जाती हैं, पुण्य की प्राप्ति से लेकर प्रसाद का प्रकार बदल जाता है, त्योहारों से लेकर पकवान बदल जाता है, किसी को शाकाहार तो किसी को मांसाहार पसंद आता है, लेकिन क्या ये जमीनी सच्चाई इंसान को समझ आता है।
धार्मिक मान्यताओं की माने तो हमारे सामाजिक संरचना में कर्म के आधार वर्ण की व्यवस्था थी, लेकिन चतुर, लोभी और ताकतवरों ने इसे वर्ण से जाति में बदल दिया, पहले मनुष्य की पहचान कर्म से होती थी लेकिन अब तो जन्म से जाति तय कर दी जाती है। ईश्वर को भी जातियों में बाट दिया है जबकि ईश्वर ने सबको एक सामान ही बनाया लेकिन किसी सम्मान ज्यादा है और किसी को अभिमान ज्यादा है। गीता ने कर्म पर बहुत कुछ लिखा है और विद्वानों ने बताया है कि इसका अर्थ है कि कर्म ही पूजा है।
रामायण के इस चौपाई को क्या आपने पढ़ा या सुना है “कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा” । कलयुग में ईश्वर का नाम जपने मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति मिलेगी। लेकिन इन बातों को सकारत्मक रूप से समझाने की बजाये, आज कुछ ज्ञानचंद अपने नफे नुकसान के अनुसार इसका सार या विस्तार को परिभाषित करेगा। वो करे भी क्यों क्योंकि वो जानती हैं इस समाज स्वार्थ से भरपूर लोगों की संख्या इतनी ज्यादा है कि हमारे धंधा खूब दौड़ेगा। क्योंकि वो जानते हैं कि इस भीड़ ऐसे हष्टपुष्ट हैं की जो भगदड़ मचने पर मासूमों को रौंदकर अपनी जान को बचाया है, क्योंकि वो जानते हैं कि इस भीड़ में समाज के वो सज्जन और संस्कारिक मानुष भी हैं जिन्होंने भगदड़ में देवी स्वरुप माताओं को कुचलकर जीवनदान पाया है। तो भला उस ज्ञानचंद के अन्दर अभिमान क्यों ना आये, उसको ताकत क्यों न मिले? उसकी सनक क्यों न बढ़े?
ये पहली बार नहीं था जब ऐसा हुआ हो, लगभग कारण वही था बस वक़्त अलग था… कई सौ वर्षों तक कबीलों और उसके बाद गोरों के गुलामी से स्वतंत्र हुआ विशाल साम्राज्य, विश्व के विशाल धार्मिक मेले की तैयारियों में जुट गया, 1954 का वर्ष 14 जनवरी से 3 मार्च तक विशाल मेले का आयोजन हुआ, भव्य तैयारियां की गयीं… स्वयं स्वतंत्र विशाल साम्राज्य के शासक इसमें शामिल हुए, फिर वो तारीख आई जिसने आने वाले भविष्य के कई संकेत दिए…
3 फरवरी को वो स्नान था जिसके बारे में मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में मौन रहकर स्नान किया जाता है, दो अफवायें फैली, पहला कि एक हाथी की वजह से भगदड़ मच गयी, दूसरी की स्वतंत्र विशाल साम्राज्य के पहले शासक का आगमन हुआ है। फिर शायद कारण वही बना, जिसका जिक्र हमने वर्तमान के घटना क्रम में किया। ये स्वतंत्र विशाल साम्राज्य का पहला विशाल मेला था, लिहाजा जिम्मेदार तैयारियों में किसी तरह का कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। अमृत से भरपूर नदियों के संगम के करीब ही अस्थाई रेलवे स्टेशन बनाया गया था। बड़ी संख्या में टूरिस्ट गाइड अपॉइंट किए गए थे। बुलडोजर से उबड़-खाबड़ जमीनें समतल की गई थीं। सड़कों पर बिछी रेलवे लाइनों के ऊपर पुल बनाए गए थे। पहली बार कुंभ में बिजली के खंभे लगाए गए। करीब एक हजार खंभे। 9 अस्पताल खोले गए, ताकि कोई बीमार पड़े या हादसे का शिकार हो तो उसे फौरन मेडिकल फैसिलिटी मुहैया कराई जा सके।
उस वक़्त विशाल साम्राज्य की आबादी करीब साढ़े 37 करोड़ थी, और विशाल मेले में करीब 50 लाख मानस का आगमन हुआ था। नया स्वतंत्र साम्राज्य था, धीरे धीरे विकास की ओर निहार रहा था, आवागमन के साधन कम थे, लेकिन भगदड़ हुई और करीब 800 से 1000 मानस ने अपने देह को त्याग दिया और विशाल साम्राज्य के मंत्रियों, अधिकारीयों और बड़े व्यापारियों को मेले में जाने से बचने की सलाह दी गयी थी। अख़बारों के पन्नों जाँच करने वाली कमेटी के रिपोर्ट का जिक्र हुआ, जिम्मेदार सरकार थी और दोष सूचनाओं का संकलन करने वालों पर था। स्वयं स्वतंत्र विशाल साम्राज्य के शासक वहां पहुंचे और जायजा लिया।
वर्ष बिताता चला गया, अन्य क्षेत्रों में लगने वाले सामान्य मेले से खबरें आती रहीं कि भगदड़ हुआ और कई मानस ने आपने देह को त्याग दिया। फिर 12 वर्ष बाद लगने वाले विशाल मेले से खबर आई कि करीब 12 वर्ष पूर्व विशाल मेले का आयोजन हुआ, रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा कर्मियों ने भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की लेकिन भगदड़ मच गयी और करीब 36 मानस ने आपने देह को त्याग दिया।
इस विशाल मेले की कई कहानियां हैं, वर्तमान में घट रही घटनाओं ने एक साथ कई घटनाओं की याद ताजा कर दी। ये विशाल मेले की एक तस्वीर है दूसरी तस्वीर अद्भुद है, दावा है कि करीब 144 करोड़ की आबादी वाले विशाल साम्राज्य के करीब 50 करोड़ मानस वर्तमान के विशाल मेले शामिल हुए, उन्होंने अमृत से भरपूर नदियों के संगम में पवित्र स्नान भी किया और उन तस्वीरों को सार्वजानिक भी किया। कई साधू संतो ने वर्तमान के जिम्मेदार प्रदेश के शासक की बेहतर व्यवस्था के लिए प्रशंसा भी की। आम मानस संग विशाल साम्राज्य के मंत्रियों, अधिकारीयों और व्यापारियों के आने का सिलसिला जारी है… जिसकी खुबसूरत तस्वीरें सबका मान मोह लेती हैं…

