रिपोर्टर: हर्ष गुप्ता
लखीमपुर खीरी जिले के दुधवा टाइगर रिज़र्व (Dudhwa Tiger Reserve) क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने का एक प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है। जहां आम लोग जंगल के नाम से ही सिहर उठते हैं, वहीं बाघ संरक्षण फाउंडेशन (Tiger Conservation Foundation) के अंतर्गत कार्यरत नाजरून निशा बेखौफ होकर सांपों और अन्य जंगली जीवों का रेस्क्यू कर रही हैं। हाल ही में एक ही दिन में तीन अजगरों का सफल रेस्क्यू कर उन्होंने न सिर्फ वन विभाग (Forest Department) बल्कि पूरे इलाके में अपनी अलग पहचान बना ली है।
नाजरून निशा का यह कार्य केवल एक साहसिक प्रयास नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का प्रतीक बनकर उभरा है। उनका मानना है कि जंगल और इंसान के बीच बढ़ते टकराव को कम करने के लिए ऐसे प्रयास बेहद जरूरी हैं।
एक दिन में तीन अजगरों का सुरक्षित रेस्क्यू:
हाल ही में दुधवा टाइगर रिज़र्व क्षेत्र के अलग-अलग स्थानों से अजगर निकलने की सूचना मिली थी। ग्रामीणों में दहशत का माहौल था और किसी भी अप्रिय घटना की आशंका बनी हुई थी। सूचना मिलते ही नाजरून निशा अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचीं और पूरी सावधानी के साथ एक-एक कर तीनों अजगरों को सुरक्षित पकड़ा। इसके बाद उन्हें जंगल के सुरक्षित हिस्से में छोड़ दिया गया, जिससे न तो ग्रामीणों को कोई नुकसान हुआ और न ही वन्यजीवों को।
डर से ज्यादा जिम्मेदारी का एहसास:
एबीटी (ABT) से खास बातचीत में नाजरून निशा ने बताया कि रेस्क्यू के दौरान डर से ज्यादा जिम्मेदारी का भाव हावी रहता है। उनका कहना है कि सबसे पहला ख्याल यही होता है कि अजगरों और आसपास मौजूद लोगों—दोनों को सुरक्षित निकालना है। घबराहट की स्थिति में नुकसान किसी का भी हो सकता है, इसलिए मानसिक संतुलन बनाए रखना सबसे जरूरी होता है।
एक छोटी चूक भी बन सकती है खतरा:
नाजरून निशा बताती हैं कि सांपों के साथ काम करते समय एक सेकेंड की चूक भी भारी पड़ सकती है। हर कदम बहुत सोच-समझकर और प्रशिक्षण के अनुसार उठाना पड़ता है। अजगर जैसे बड़े और ताकतवर सांप को संभालना आसान नहीं होता, लेकिन सही तकनीक और अनुभव से जोखिम को कम किया जा सकता है।
भीड़ और अंधेरा बढ़ाते हैं चुनौती:
रेस्क्यू के दौरान सबसे बड़ी चुनौतियों में भीड़, अंधेरा और घबराए हुए लोग शामिल होते हैं। नाजरून के अनुसार, कई बार लोग डर के कारण गलत कदम उठा लेते हैं, जिससे स्थिति और ज्यादा जोखिम भरी हो जाती है। ऐसे में टीमवर्क और ट्रेनिंग ही सबसे बड़ा सहारा बनती है, जिससे हालात को नियंत्रित किया जा सके।
महिला रेस्क्यूर के रूप में बनी मिसाल:
वन्यजीव रेस्क्यू जैसे जोखिम भरे कार्य में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित मानी जाती है। ऐसे में नाजरून निशा का आगे आकर इस जिम्मेदारी को निभाना समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश है। उनके इस कार्य से न केवल अन्य महिलाओं को प्रेरणा मिल रही है, बल्कि समाज की सोच में भी धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिल रहा है।
वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा का संतुलन:
नाजरून निशा का मानना है कि वन्यजीव संरक्षण का मतलब केवल जानवरों को बचाना नहीं, बल्कि इंसानों को सुरक्षित रखना भी है। सही समय पर सही कदम उठाकर दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। दुधवा टाइगर रिज़र्व जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह संतुलन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
स्थानीय लोगों में बढ़ा भरोसा:
लगातार सफल रेस्क्यू अभियानों के बाद स्थानीय लोगों का भरोसा भी बढ़ा है। अब ग्रामीण किसी जंगली जानवर के दिखने पर घबराने के बजाय तुरंत सूचना देते हैं, जिससे समय रहते स्थिति को संभाला जा सके। यह भरोसा वन विभाग और रेस्क्यू टीम के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
भविष्य में भी जारी रहेगा अभियान:
नाजरून निशा ने बताया कि उनका प्रयास रहेगा कि भविष्य में भी इसी तरह निडर होकर रेस्क्यू कार्य जारी रखें और लोगों में जागरूकता फैलाएं। उनका मानना है कि डर के बजाय समझ और जानकारी से ही इंसान और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व संभव है।
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