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दिल्ली से लेकर बंगाल और महाराष्ट्र तक इन दिनों एक जांच एजेंसी छाई हुई है, जिसका नाम है ईडी. नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी से पूछताछ हुई है, तो वहीं बंगाल के बर्खास्त मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी से पूछताछ जारी है, जबकि महाराष्ट्र में शिवसेना नेता संजय राउत को पात्रा चॉल घोटाले में गिरफ्तार किया गया है. ईडी के छापे यूपी के गाज़ीपुर से बसपा सांसद अफजाल अंसारी पर भी पड़ रहे हैं और वहीं मऊ सदर के पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी और करीबी भी ईडी की रडार पर हैं। तो आइए जानते हैं, ये ईडी है क्या, कब बना, इसकी ताकत क्या है और अबतक क्या कार्रवाइयां हुई हैं.
प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना 01 मई, 1956 को हुई थी, जब विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम,1947 (फेरा,1947) के अंतर्गत विनिमय नियंत्रण विधियों के उल्लंघन को रोकने के लिए आर्थिक कार्य विभाग के नियंत्रण में एक ‘प्रवर्तन इकाई’ गठित की गई थी। विधिक सेवा के एक अधिकारी, प्रवर्तन निदेशक के रूप में, इस इकाई के मुखिया थे, जिनके संरक्षण में यह इकाई भारतीय रिजर्व बैंक से प्रतिनियुक्ति के आधार पर एक अधिकारी और विशेष पुलिस स्थापना से 03 निरीक्षकों की सहायता से कार्य करती थी । आरम्भ में केवल मुम्बई और कलकत्ता में इसकी शाखाएं थी । वर्ष 1957 में इस इकाई का ‘प्रवर्तन निदेशालय’ के रूप में पुनः नामकरण कर दिया गया था तथा मद्रास में इसकी एक और शाखा खोली गई। वर्ष 1960 इस निदेशालय का प्रशासनिक नियंत्रण, आर्थिक कार्य मंत्रालय से राजस्व विभाग में हस्तान्तरित कर दिया गया था।
प्रवर्तन निदेशालय (Directorate General of Economic Enforcement), भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन एक विशेष वित्तीय जांच एजेन्सी है जिसका मुख्यालय नयी दिल्ली में है। प्रवर्तन निदेशक, इसके प्रमुख है। पाँच क्षेत्रीय कार्यालय मुंबई, चेन्नै, चंडीगढ़, कोलकाता तथा दिल्ली हैं जिनके विशेष निदेशक प्रवर्तन प्रमुख हैं। निदेशालय में क्षेत्रीय कार्यालय अर्थात अहमदाबाद, बंगलौर, चंडीगढ़, चेन्नई, कोच्ची, दिल्ली, पणजी, गुवाहाटी, हैदराबाद, जयपुर, जालंधर, कोलकाता, लखनऊ, मुंबई, पटना तथा श्रीनगर हैं। जिनके प्रमुख संयुक्त निदेशक है। निदेशालय में उप क्षेत्रीय कार्यालय अर्थात भुवनेश्वर, कोझीकोड, इंदौर, मदुरै, नागपुर, इलाहाबाद, रायपुर, देहरादून, रांची, सूरत, शिमला हैं। जिनके प्रमुख उप निदेशक है।

मूलतः निदेशालय निम्नलिखित कार्य करता हैः
- (१) विदेशी मुद्रा प्रबन्धन अधिनियम, 1999 (फेमा) – यह अधिनियम 1-6-2000 को प्रभावी हुआ था। इसके प्रावधानों के उल्लंघन की जांच तथा निपटान प्रवर्तन निदेशालय के नामित प्राधिकारियों द्वारा किया जाता है। इसके अंतर्गत अर्द्धन्यायिक जांच प्रक्रिया के दौरान उल्लंघन सिद्ध होने की स्थिति में संबंधित व्यक्ति/फर्म/ईकाई के ऊपर संलिप्तन राशि के तीन गुना तक की राशि का आर्थिक दण्ड लगाया जा सकता है।

(२) ‘धनशोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) – इस अधिनियम के अन्तर्गत जांच की प्रक्रिया अन्य अपराधिक कानूनों की तरह ही की जाती है। जांच के दौरान या उपरान्त यदि यह पाया जाता है कि संबंधित व्यंक्ति/इकाई ने जो संपत्ति एकत्र की है या बनाई है, वह पीएमएलए में अधिसूचित 28 कानूनों की 156 धाराओं में दण्डित अपराधों के फलस्वरूप अर्जित की गयी है तथा उसके बाद उसका शोधन (लॉण्डरिंग) किया जा चुका है, उस स्थिति में ऐसी सम्पत्ति को अन्तरिम रूप में जब्त किया जा सकता है, और अन्त में उचित अपराधिक न्यायिक प्रक्रिया (मुकदमा) पूर्ण होने पर ऐसी संपत्ति को कुर्क भी किया जाता है।



कहां जाता है हजारों करोड़ काला धन
जांच एजेंसियां जो पैसे जब्त करती हैं, उसे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI), स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) में केंद्र सरकार के अकाउंट में जमा करा देती हैं। कई केस ऐसे भी होते हैं, जिसका पैसा जांच एजेंसी अपने पास रख लेती है और केस की सुनवाई तक यह पैसा उन्हीं के पास रहता है। लेकिन अगर ईडी के हाथ प्रॉपर्टी लगी है तो PMLA (Prevention of Money Laundering Act, 2002) के सेक्शन 5 (1) के तहत इस प्रॉपर्टी को अटैच कर दिया जाता है। कोर्ट में जब यह साबित हो जाता है तो इसे PMLA के सेक्शन 9 के तहत सरकार अपने कब्जे में ले लेती है। इस प्रॉपर्टी पर लिखा जाता है कि इस संपत्ति की खरीद, बिक्री या इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
कितने दिन प्रॉपर्टी अपने पास रख सकती है ED
अब बात, उस प्रॉपर्टी की जो ED अपने पास रख सकती है। कभी-कभी केस की सुनवाई पूरी होने तक ईडी प्रॉपर्टी या कैश अपने पास रखती है लेकिन इसकी अवधि कितनी होती है। इसको लेकर पीएमएलए का नियम कहता है कि ईडी सिर्फ 180 दिन यानी 6 महीने तक ही प्रॉपर्टी को अपने पास रख सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोर्ट में आरोपी दोषी साबित हो जाता है तो प्रॉपर्टी सरकार की हो जाती है। लेकिन अगर वह दोषी साबित नहीं होता तो प्रॉपर्टी उसी की रहेगी। कई बार प्रॉपर्टी के मालिक पर कुछ फाइन लगाकर कोर्ट उसे प्रॉपर्टी लौटा देती है।
पंचनामा में क्या लिखती हैं जांच एजेंसी
जब जांच एजेंसी कहीं छापा मारती है। वहां से प्रॉपर्टी या पेपर डॉक्यूमेंट्स, कैश, गोल्ड, सिल्वर या कोई दूसरी कीमती चीज जब्त होती है तो उसका पंचनामा बनाया जाता है। पंचनामा में जिसकी प्रॉपर्टी जब्त की जा रही है, उसके सिग्नेचर भी लिए जाते हैं। इसके बाद प्रॉपर्टी को सीज कर दिया जाता है। इसे केस प्रॉपर्टी कहते हैं। पंचनामा में लिखा जाता है कि कितना कैश बरामद हुआ है। इसमें नोटों की कितनी गड्डियां हैं। कितनी नोट हैं। 200 या 500 या अन्य कितने नोट हैं। किसी नोट पर कोई निशान है या नहीं। इस पंचनामा रिपोर्ट को जांच एजेंसी अपने पास रखती है औऱ कोर्ट में इसे सबूत के तौर पर पेश किया जाता है।
विपक्ष सरकार पर ईडी या अन्य केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप क्यों लगता है? आइए समझते हैं कब कितनी कार्रवाइयां हुई?
आपको याद होगा कि 2014 से पहले यानी 2013 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा था कि कांग्रेस हमें सीबीआई से ना डराए। उस समय पीएम मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अब यही आरोप कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल मोदी सरकार पर लगा रहे हैं। आइए जानते हैं कि मनमोहन सरकार में कितनी कार्रवाई हुई और मोदी सरकार में कितनी कार्रवाई हुई?
30 जुलाई 2022 को प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान ईडी ने 112 छापेमारी की और इन छापेमारी से 5,346 करोड़ की संपत्ति पकड़ी गई। जबकि 2014 के बाद ईडी ने 2,974 छापेमारी की और इन छापेमारी में तकरीबन 95,486 हजार करोड़ की संपत्ति जब्त की गई।
अब ईडी तो वित्त मंत्रालय के अधीन काम करती है। वैसे लोकतंत्र को मानने वाली सरकारें, संवैधानिक तरीके से ही काम करती होंगी। आपका क्या मानना है?


