वाराणसी (Varanasi) में शनिवार को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (Swami Avimukteshwaranand) ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के हालिया बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सनातन धर्म में शंकराचार्य की पहचान किसी राजनीतिक प्रमाणपत्र से निर्धारित नहीं होती। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सरकार या कोई राजनीतिक दल यह तय नहीं कर सकता कि कौन शंकराचार्य होगा और कौन नहीं।
राजनीतिक प्रमाणपत्र से तय नहीं होती परंपरा:
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि सनातन परंपरा में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें कोई मुख्यमंत्री या सरकार किसी को प्रमाणपत्र देकर शंकराचार्य नियुक्त करे। उन्होंने स्वामी वासुदेवानंद (Swami Vasudevanand) का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें शंकराचार्य का प्रमाणपत्र दिया गया, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) और सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इस पर रोक लगाई है। उनके अनुसार न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि उन्हें शंकराचार्य न कहा जाए।
सदन में दिए गए बयान पर प्रतिक्रिया:
उन्होंने कहा कि सदन में मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया वक्तव्य सुनने में उचित लग सकता है, लेकिन प्रश्न यह है कि जैसे कोई व्यक्ति अपने नाम के आगे मुख्यमंत्री लिखता है, उसी प्रकार जो शंकराचार्य है, वह अपने नाम के आगे यह उपाधि क्यों न लिखे। उनका कहना था कि शंकराचार्य की परंपरा धार्मिक और आध्यात्मिक आधार पर तय होती है, न कि राजनीतिक स्वीकृति से।
परंपरा और योगी की भूमिका पर सवाल:
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि गोरखनाथ परंपरा (Gorakhnath Tradition) की वाणी में स्पष्ट है कि योगी बनने के बाद राजसत्ता से दूरी रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राजा योगी बन सकता है, लेकिन योगी पुनः राजा नहीं बनता। ऐसे में यदि कोई स्वयं को योगी और विरक्त कहता है, तो उसके द्वारा मुख्यमंत्री पद स्वीकार करना परंपरागत प्रश्न खड़ा करता है।
शंकराचार्य की परिभाषा पर टिप्पणी:
उन्होंने कहा कि सनातन में शंकराचार्य वह है, जो सत्य का पालन करे और धर्म की रक्षा के लिए कार्य करे। यह परिभाषा नई नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही है। उनके अनुसार किसी भी धार्मिक पद की मर्यादा आध्यात्मिक आचरण से तय होती है।
राजनीतिक संदर्भों पर बयान:
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) और अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) का उल्लेख करते हुए कहा कि अतीत में भी ऐसे प्रसंग सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि यदि अहंकार की राजनीति की जाएगी तो उसका परिणाम भी सामने आएगा। उन्होंने यह भी कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की भाषा मर्यादित होनी चाहिए और कानून की चर्चा प्रक्रिया और दायित्व के संदर्भ में होनी चाहिए, न कि प्रभाव या कठोरता के रूप में।
इस पूरे घटनाक्रम ने धार्मिक परंपरा, राजनीतिक मर्यादा और संवैधानिक दायित्वों को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। विभिन्न पक्ष अपने-अपने दृष्टिकोण से इस मुद्दे पर विचार रख रहे हैं।
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