श्री माता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी (Shri Mata Vaishno Devi University) के अधीन संचालित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस (Shri Mata Vaishno Devi Institute of Medical Excellence) में वर्ष 2025 से MBBS की पढ़ाई शुरू हुई थी, लेकिन मान्यता रद्द होने के बाद पूरा संस्थान विवादों के केंद्र में आ गया है। मान्यता समाप्त होते ही सभी छात्र-छात्राएं अपने-अपने घर लौट गए। इस पूरे मामले ने यूनिवर्सिटी की फंडिंग, एडमिशन प्रक्रिया और संस्थान के संचालन को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
यूनिवर्सिटी और इससे जुड़े मेडिकल कॉलेज को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह संस्थान केवल दान की राशि से चलता है या फिर इसमें सरकारी मदद भी शामिल है। सामने आए दस्तावेजों के अनुसार जम्मू-कश्मीर सरकार (Jammu and Kashmir Government) से यूनिवर्सिटी को हर साल आर्थिक सहायता मिलती रही है। वर्ष 2017 से 2025 के बीच सरकार की ओर से करीब 121 करोड़ रुपए की मदद दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
MBBS एडमिशन और शुरू हुआ विवाद:
श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस को सितंबर 2025 में 50 सीटों पर MBBS एडमिशन की अनुमति मिली थी। पहले बैच में कुल 50 में से 42 कश्मीरी मुस्लिम, 7 हिंदू और 1 सिख छात्र ने दाखिला लिया। एडमिशन के कुछ समय बाद ही विवाद खड़ा हो गया, जब वैष्णो देवी संघर्ष समिति ने मुस्लिम छात्रों के दाखिले का विरोध शुरू किया। यह समिति 22 नवंबर को गठित की गई थी, जिसमें 50 से अधिक संगठन शामिल बताए गए। इनमें RSS और BJP से जुड़े संगठनों का नाम भी सामने आया। बजरंग दल ने मेडिकल कॉलेज के खिलाफ सार्वजनिक प्रदर्शन किए।
संविधान और अल्पसंख्यक संस्थान का सवाल:
भारतीय संविधान के आर्टिकल-30 के तहत अल्पसंख्यकों को अपने समुदाय के लिए 50 प्रतिशत तक आरक्षण के साथ शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार है। हालांकि 34 एकड़ भूमि पर बना श्री माता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी श्राइन बोर्ड के स्वामित्व वाली जमीन पर स्थित है और इसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त नहीं है। इसी बिंदु को लेकर विरोध करने वाले संगठनों ने सवाल उठाए और कहा कि यहां केवल हिंदू छात्रों को ही पढ़ने की अनुमति दी जानी चाहिए।
सरकारी मदद बनाम दान का दावा:
वैष्णो देवी संघर्ष समिति का दावा रहा कि यूनिवर्सिटी का निर्माण और संचालन श्राइन बोर्ड के फंड से हुआ है, जो श्रद्धालुओं के दान से एकत्र किया जाता है। इसी आधार पर समिति ने मुस्लिम छात्रों को कॉलेज से हटाने की मांग उठाई। इसके बाद जम्मू (Jammu) में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। वहीं दूसरी ओर दस्तावेजों से यह स्पष्ट हुआ कि यूनिवर्सिटी को नियमित रूप से सरकारी ग्रांट मिलती रही है।
फीस स्ट्रक्चर और छात्रों पर आर्थिक बोझ:
सूत्रों के मुताबिक मेडिकल कॉलेज का वार्षिक फीस स्ट्रक्चर भी सामने आया है। इसमें 4.95 लाख रुपए ट्यूशन फीस, 50 हजार रुपए रिफंडेबल सिक्योरिटी डिपॉजिट, करीब 51 हजार रुपए वन टाइम कॉलेज चार्ज और 20 हजार रुपए सालाना हॉस्टल फीस शामिल है। यूनिवर्सिटी और मेस चार्ज को मिलाकर एक छात्र का सालाना खर्च लगभग 5.5 लाख रुपए बैठता है। छात्रों का कहना है कि इतनी भारी रकम जमा करने के बाद अचानक कॉलेज की मान्यता रद्द होना उनके भविष्य पर सीधा असर डाल रहा है।
आठ साल में 121 करोड़ की सरकारी सहायता:
हिंदू संगठनों की ओर से यह दावा भी किया गया कि यूनिवर्सिटी देश की इकलौती ऐसी यूनिवर्सिटी है, जो मुस्लिम बहुल सरकार में बिना सरकारी फंड के चल रही थी। हालांकि बजट दस्तावेजों से यह दावा सही नहीं ठहरता। जानकारी के अनुसार 2017-18 में यूनिवर्सिटी को 10 लाख रुपए, 2018-19 में 50 लाख रुपए और 2019-20 में 5 करोड़ रुपए की मदद मिली। इसके बाद 2020-21 में 19.70 करोड़, 2021-22 में 21 करोड़, 2022-23 में 23 करोड़, 2023-24 में 24 करोड़ और 2024-25 में 28 करोड़ रुपए की ग्रांट दी गई। चालू वर्ष के लिए भी 28 करोड़ रुपए की मंजूरी दी गई है।
मान्यता रद्द होने की वजहें:
नेशनल मेडिकल कमीशन (National Medical Commission) को मेडिकल कॉलेज के खिलाफ कई शिकायतें मिली थीं। इनमें अपर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर, योग्य टीचिंग फैकल्टी और रेजिडेंट डॉक्टरों की कमी, मरीजों की संख्या कम होना और बेड ऑक्यूपेंसी का मानकों से नीचे होना शामिल था। मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड (Medical Assessment and Rating Board) की टीम ने 2 जनवरी 2026 को कॉलेज का निरीक्षण किया। रिपोर्ट में सामने आया कि टीचिंग फैकल्टी में 39 प्रतिशत और ट्यूटर, डेमोंस्ट्रेटर व सीनियर रेजिडेंट की 65 प्रतिशत कमी है। ओपीडी में जरूरी संख्या से 50 प्रतिशत से भी कम मरीज थे, जबकि बेड ऑक्यूपेंसी सिर्फ 45 प्रतिशत पाई गई।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कई विभागों में प्रैक्टिकल और रिसर्च लैब नहीं हैं। लाइब्रेरी में जरूरी किताबों और जर्नल की संख्या मानकों से काफी कम पाई गई। ART सेंटर, MDR-TB मैनेजमेंट सुविधा, ऑपरेशन थिएटर और अलग-अलग मेल-फीमेल वार्ड जैसी अनिवार्य सुविधाएं या तो मौजूद नहीं थीं या फिर अपर्याप्त थीं। इन कमियों के आधार पर नेशनल मेडिकल कमीशन ने कॉलेज की मान्यता तत्काल प्रभाव से वापस ले ली।
छात्रों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं:
NSUI के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट फिरोज खान ने कहा कि मेडिकल कॉलेज बंद होने से जम्मू-कश्मीर के छात्रों का भारी नुकसान हुआ है। उनका कहना है कि यदि संस्थान को अल्पसंख्यक घोषित करना था, तो इसके लिए वैधानिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी, न कि धार्मिक आधार पर विभाजन किया जाना चाहिए था।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला (Omar Abdullah) ने भरोसा दिलाया है कि छात्रों का भविष्य खराब नहीं होने दिया जाएगा और उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेजों की अतिरिक्त सीटों पर शिफ्ट किया जाएगा।
छात्रों की पीड़ा और अनिश्चित भविष्य:
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिम छात्रों का कहना है कि NEET की थर्ड राउंड काउंसलिंग के जरिए उन्हें मेरिट के आधार पर एडमिशन मिला था। कॉलेज के अंदर कभी भी धर्म के आधार पर भेदभाव महसूस नहीं हुआ। बाहर चल रहे विरोध प्रदर्शनों का असर पढ़ाई के माहौल पर नहीं पड़ा, लेकिन मान्यता रद्द होने के बाद वे घर लौटने को मजबूर हो गए। वहीं हिंदू छात्रों का कहना है कि कॉलेज में उन्हें बेहतर सुविधाएं मिल रही थीं और अब ट्रांसफर प्रक्रिया को लेकर अनिश्चितता और तनाव बढ़ गया है।
चांसलर और फंडिंग का ढांचा:
इस कॉलेज के चांसलर जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा (Manoj Sinha) हैं। कॉलेज का प्रबंधन श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (Shri Mata Vaishno Devi Shrine Board) के हाथ में है, जबकि फंडिंग श्राइन बोर्ड, जम्मू-कश्मीर सरकार और मानव संसाधन विकास मंत्रालय (Ministry of Human Resource Development) के जरिए होती है। इसी फंडिंग मॉडल को लेकर विवाद और सवाल लगातार बने हुए हैं।
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VaishnoDevi, MedicalCollege, JammuAndKashmir, NMC, MBBS

