अमेरिका की नई व्यापार नीति के तहत फार्मा उत्पादों पर उच्च शुल्क लगाने की धमकी ने भारतीय दवा उद्योग को गहरी चिंता में डाल दिया है। खबरों के अनुसार, अमेरिकी ट्रंप प्रशासन ने भारत समेत कई देशों से आयात होने वाली दवाओं पर 150 से 200 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया है। यदि यह कदम उठाया गया, तो भारत के 87,000 करोड़ रुपये के निर्यात पर बड़ा संकट मंडरा सकता है।
अमेरिकी बाजार पर सबसे ज्यादा निर्भर भारत
वर्तमान में भारत, अमेरिका को 90 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं निर्यात करता है, जिनकी वजह से वहां सस्ती चिकित्सा उपलब्ध हो पाती है। अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली का बड़ा हिस्सा इन सस्ती दवाओं पर निर्भर है। अगर भारी-भरकम टैरिफ लगाया गया, तो अमेरिका में इलाज महंगा हो जाएगा। वहीं भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाएगा। इससे जहां अमेरिकी नागरिकों को जेब से ज्यादा खर्च करना पड़ेगा, वहीं भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए यह एक बड़ा झटका साबित होगा।
टैरिफ में 200% तक बढ़ोतरी की चेतावनी
अमेरिकी सरकार फिलहाल सभी मेडिकल आयातों पर औसतन 10 प्रतिशत का शुल्क लगाती है, लेकिन नई नीति के तहत इस शुल्क को बढ़ाकर 200 प्रतिशत तक करने की चेतावनी दी गई है। यह कदम, बौद्धिक संपदा, व्यापार असंतुलन और दवा कीमतों को लेकर चल रहे विवादों के बीच सामने आया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका यह कदम उठाता है, तो भारतीय कंपनियां न केवल अमेरिकी बाजार खो सकती हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर उनका दबदबा भी कमजोर होगा।
भारतीय निर्यात पर गहरा असर
भारत का कुल दवा निर्यात बाजार लगभग 80 अरब डॉलर (करीब 6.5 लाख करोड़ रुपये) का है, जिसमें अकेले अमेरिका का हिस्सा करीब 2.65 लाख करोड़ रुपये है। यानी कुल निर्यात का एक-तिहाई से ज्यादा हिस्सा अमेरिकी बाजार से आता है। इसलिए, यदि अमेरिकी टैरिफ में यह उछाल आता है, तो सीधा असर भारतीय कंपनियों की आय और शेयर बाजार पर पड़ेगा।
नए बाजार तलाशने की जरूरत
उद्योग से जुड़े जानकार मानते हैं कि भारतीय कंपनियों को अब नए बाजार तलाशने की जरूरत होगी। रूस, नीदरलैंड, ब्राजील, लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी देश ऐसे बाजार बन सकते हैं, जहां भारतीय जेनेरिक दवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है। हालांकि, अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी और उसका मुनाफा बाकी देशों से ज्यादा है। इस वजह से नुकसान की भरपाई तुरंत करना कठिन होगा।
अमेरिका में भी बढ़ेगी दवा कीमतें
दूसरी ओर, अमेरिकी स्वास्थ्य क्षेत्र में भी असंतोष बढ़ सकता है। वहां के अस्पताल, बीमा कंपनियां और उपभोक्ता संगठन पहले ही दवा कीमतों को लेकर चिंतित हैं। अगर सस्ती भारतीय दवाएं बाजार से बाहर होती हैं, तो अमेरिकी नागरिकों को दोगुना-तीन गुना तक ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। इससे राजनीतिक दबाव भी बन सकता है, जो अमेरिका को अपने निर्णय पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर सकता है।
दीर्घकालिक रणनीति पर जोर
कुल मिलाकर, ट्रंप प्रशासन की यह धमकी वैश्विक फार्मा उद्योग में हलचल मचा सकती है। भारत के लिए यह चेतावनी है कि वह केवल एक बाजार पर निर्भर न रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक रणनीति के तहत भारत को नए निर्यात मार्ग, उन्नत दवा अनुसंधान और घरेलू विनियामक सुधार पर ध्यान देना होगा।

