रिपोर्टर: हर्ष गुप्ता
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के लखीमपुर खीरी (Lakhimpur Kheri) जिले के भैरमपुर गांव में एक अनोखी और रोचक शादी ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। इस अद्वितीय विवाह में न दूल्हे की बारात निकली और न ही दुल्हन का सिंदूरदान हुआ। यहां दूल्हा बना गांव का कुआं और दुल्हन बनी इमली का पेड़। पूरे गांव में इस अनोखी घटना को लेकर उत्साह का माहौल रहा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह संपन्न किया गया।

शादी का अनोखा आयोजन:
गांव में आयोजित इस अद्भुत विवाह में लोग डीजे की धुन पर झूमते नजर आए। ग्रामीणों ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ शादी की रस्मों में हिस्सा लिया और भोज का भी आयोजन किया गया। समारोह में उपस्थित लोगों ने इसे गांव की सांस्कृतिक धरोहर बताया।
पंडित द्वारा किए गए विशेष विधान:
पंडित कृपा शंकर (Kripa Shankar) ने पुरानी परंपरा के अनुसार विवाह की पूरी विधि-विधान से संपन्न कराई। आम की लकड़ी से कुएं का ‘वर स्वरूप’ पुतला तैयार किया गया, जिसे माला और पगड़ी पहनाई गई। इसके बाद पवित्र धागे से उसे सजाया गया। इस धागे का दूसरा सिरा लगभग 400 मीटर दूर स्थित आम के बाग में इमली के पौधे से बांधा गया। इमली पक्ष के लोगों ने पौधे को सुहाग की सभी वस्तुओं से सजाया, जैसे किसी दुल्हन को सजाया जाता है।
परंपरा की शुरुआत वर्ष 1960 से:
बुजुर्ग जगन्नाथ प्रसाद यादव के अनुसार इस अनोखी परंपरा की शुरुआत वर्ष 1960 में हुई थी। उस समय गांव के खुशीराम यादव के कुएं का विवाह इमली के पेड़ से कराया गया था। इसके बाद वर्ष 1995 में भी इसी प्रकार का विवाह संपन्न हुआ। गांव के बंटवारे के बाद कुआं परिवार के एक हिस्से में चला गया, जिससे महिलाओं के लिए रस्में निभाना कठिन हो गया। इसके अतिरिक्त पुराना इमली का वृक्ष दीमक की मिट्टी में नष्ट हो गया था।
परंपरा को आगे बढ़ाने की पहल:
पुरानी परंपरा को जीवित रखने के उद्देश्य से वर्ष 2024 में नया इमली का पौधा लाकर आम के बाग में लगाया गया। ग्रामीणों ने मिलकर निर्णय लिया कि इस अनोखी परंपरा को पुनः शुरू करते हुए कुएं और इमली का विवाह फिर से कराया जाए। ग्रामीणों की भारी उपस्थिति ने इस परंपरा के महत्व को और अधिक मजबूत बना दिया।
प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक:
गांव के लोगों का कहना है कि यह विवाह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि प्रकृति, जल-स्रोतों और पेड़ों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक अनोखा तरीका है। उनका मानना है कि ऐसी परंपराएं समाज को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती हैं और पेड़ों व जल को जीवन के अभिन्न अंग के रूप में स्थापित करती हैं।
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