कहानी ज्ञानवापी की…

अयोध्या में राम मंदिर बनाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद 9 नवंबर, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित किया था. अपने भाषण में उन्होंने कहा था, “इस फ़ैसले के बाद हमें ये संकल्प करना होगा कि अब नई पीढ़ी नए सिरे से ‘न्यू इंडिया’ के निर्माण में जुटेगी. आइए एक नई शुरुआत करते हैं.”

तीन साल बाद भारत में वापस एक बार फिर ‘ये मस्जिद, कभी मंदिर था’ पर बहस हो रही है. अचानक अदालतों में याचिकाओं की बाढ़-सी आ गई है. धार्मिक राष्ट्रवाद पर रिसर्चर शम्सुल इस्लाम कहते हैं, “लोग 5,000 साल पुरानी सभ्यता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं.”

ऐसे वक़्त में जब यूक्रेन-रूस युद्ध से दुनिया में सामरिक बदलाव हो रहे हैं, कोरोना से 62 लाख लोगों की मौत के बाद भी वायरस का ख़तरा बना हुआ है और जब साल 2019 में भारत में वायु प्रदूषण से दुनिया भर में सबसे ज़्यादा क़रीब 17 लाख लोग मारे गए.

देश इन दिनों जब गंभीर आर्थिक, सामाजिक और वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब भारत में हिंदू मुसलमान, मंदिर मस्जिद, 400, 500, 600 या हज़ार साल पहले किसने, कितने मंदिर तोड़े और क्यों, और अब उसका क्या हो – इस पर बहस ज़ोर पकड़ रही है.

अभी बहस के केंद्र में काशी की ज्ञानवापी मस्जिद है. दावा किया जाता है कि ज्ञानवापी मस्जिद की जगह कभी मंदिर था.

ब्रिटिश लाइब्रेरी में विश्वनाथ मंदिर की तस्वीर के साथ दी गई जानकारी में ज़िक्र है कि 17वीं शताब्दी में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने मंदिर को तबाह कर दिया था और आज के मंदिर को 1777 में इंदौर की अहिल्या बाई होल्कर ने बनाया था.

इतिहासकार हरबंस मुखिया कहते हैं, “काशी और मथुरा का मंदिर औरंगज़ेब ने तोड़ा था, वो उसके हुक़्म से टूटा था. उसी औरंगज़ेब ने पता नहीं कितने मंदिरों और मठों को दान भी दिया. जहां वो एक तरफ़ मंदिरों को तोड़ रहा था, वहीं दूसरी तरफ़ वो मंदिरों और मठों को दान, ज़मीन और पैसे दे रहा था.”

लेकिन आज की तारीख़ में इतिहास की जटिलता को समझना और समझाना शायद ही आसान है. और ऐसे माहौल में सवाल है कि आप इतिहास की सुई को कितना पीछे ले जाएंगे और इससे क्या हासिल करेंगे?

ताजा जानकारी के अनुसार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने आशंका जताई है कि वाराणसी ज्ञानवापी परिसर में मिली शिवलिंग जैसी संरचना की कार्बन डेटिंग कराना ठीक नहीं होगा। ऐसा करने से वह क्षतिग्रस्त हो सकती है। रचना की सही उम्र पता करने के लिए अन्य आधुनिक वैज्ञानिक तरीके का उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए 3 महीने का समय मांगा है। केस की अगली सुनवाई 30 नवंबर को होगी।

ज्ञानवापी केस की सोमवार को जस्टिस जेजे मुनीर सुनवाई
कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संबंधित संरचना को किसी भी
तरह के नुकसान से बचाना होगा। ऐसी आशंका खत्म की
जाए।
कोर्ट ने पूछा- कार्बन डेटिंग न करने की बात किस आधार
पर ?
जस्टिस जेजे मुनीर ने एएसआई से पूछा कि कार्बन डेटिंग
न करने की बात किन आधार पर कही जा रही है? इसपर
एएसआई के अधिवक्ता मनोज सिंह ने कहा कि संरचना को
कार्बन डेटिंग से हो सकने वाले नुकसान का यह शुरुआती
अनुमान है। एएसआई शिवलिंग जैसी मिली आकृति के
उम्र का पता लगाने के लिए सही तकनीक पर विचार कर
रही है। जल्द ही इसपर विस्तृत रिपोर्ट हाईकोर्ट में सौंपी
जाएगी।

ज्ञानवापी मस्जिद शृंगार गौरी केस में कई याचिकाएं दाखिल हुई हैं, ये याचिका निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट में लंबित हैं. उधर, प्लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्ट को लेकर भी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है. इस कानून के तहत अयोध्या के अलावा अन्य धर्मस्थलों की यथास्थिति बनाए रखने का हवाला कोर्ट में दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है.  


https://youtu.be/o9jsZNjx_wI

Leave a Reply

Discover more from Apna Bharat Times

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading