हरियाणा सरकार के हालिया आदेश के बाद उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में कार्यरत शिक्षकों के बीच असमंजस की स्थिति बन गई है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि निर्धारित समयसीमा के भीतर शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करना अनिवार्य होगा। इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश में करीब 1.86 लाख ऐसे शिक्षकों की चिंता बढ़ गई है, जिन्होंने अब तक टीईटी उत्तीर्ण नहीं किया है। 16 फरवरी को जारी निर्देश में हरियाणा सरकार (Haryana Government) ने शिक्षकों को मार्च 2027 तक एचटीईटी पास करने को कहा है और असफल रहने की स्थिति में सेवा समाप्ति की चेतावनी भी दी है।
यूपी में जटिल हालात:
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में स्थिति और अधिक जटिल बताई जा रही है। यहां लगभग 50 हजार ऐसे शिक्षक हैं, जिनके पास टीईटी में बैठने के लिए आवश्यक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता ही उपलब्ध नहीं है। इस पूरे प्रकरण में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के आदेश के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल की है, जिस पर अभी सुनवाई शेष है। यदि यह याचिका खारिज होती है, तो राज्य सरकार के सामने वैधानिक और प्रशासनिक विकल्पों को लेकर नई चुनौती खड़ी हो सकती है।
कोर्ट का निर्देश और समयसीमा:
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की पीठ, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन शामिल थे, ने 1 सितंबर 2025 को महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। न्यायालय ने कहा कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि पांच वर्ष से अधिक शेष है, उन्हें दो वर्षों के भीतर, यानी सितंबर 2027 तक टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा। जिनकी सेवा अवधि पांच वर्ष से कम बची है, उन्हें परीक्षा से आंशिक छूट दी गई है, लेकिन पदोन्नति के लिए टीईटी पास करना आवश्यक रहेगा।
आरटीई अधिनियम और टीईटी की अनिवार्यता:
4 अगस्त 2009 को संसद द्वारा पारित निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम (RTE-2009) को 1 अप्रैल 2010 से पूरे देश में लागू किया गया। इस अधिनियम का उद्देश्य 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को कक्षा 1 से 8 तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराना है। इसके तहत शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता के रूप में टीईटी को अनिवार्य किया गया। 27 जुलाई 2011 को जारी आदेश के माध्यम से प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर नियुक्ति के लिए टीईटी को सेवा शर्त का हिस्सा बनाया गया।
शिक्षक संगठनों का तर्क:
शिक्षक संगठनों का कहना है कि आरटीई-2009 की व्यवस्था जुलाई 2011 से प्रभावी हुई, इसलिए उससे पहले नियुक्त शिक्षकों पर इसे अनिवार्य रूप से लागू करना उचित नहीं माना जा सकता। उनका तर्क है कि पूर्व में नियुक्त शिक्षकों की सेवा शर्तों में बाद में बदलाव करना न्यायसंगत नहीं है। यही कारण है कि विभिन्न शिक्षक संघ इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं और स्पष्ट दिशा-निर्देश की मांग कर रहे हैं।
प्रमति एजुकेशनल ट्रस्ट फैसले पर सवाल:
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की पीठ ने 2014 में दिए गए कर्नाटक के प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट फैसले की भी समीक्षा की आवश्यकता जताई है। उस फैसले में आरटीई अधिनियम को अल्पसंख्यक संस्थानों, चाहे वे सहायता प्राप्त हों या गैर-सहायता प्राप्त, से पूरी तरह छूट दी गई थी। अदालत ने कहा कि इस निर्णय की पुनर्समीक्षा आवश्यक है और मामले को संवैधानिक पीठ के समक्ष भेज दिया गया है। हालांकि अभी तक संवैधानिक पीठ का गठन नहीं हुआ है।
आगे की राह पर नजर:
यदि उत्तर प्रदेश सरकार की रिव्यू पिटीशन खारिज होती है, तो राज्य को न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप निर्णय लेना होगा। ऐसे में हजारों शिक्षकों के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल सभी पक्ष न्यायालय की अगली सुनवाई और संभावित निर्णय का इंतजार कर रहे हैं।
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