Video: “80 करोड़ का सवाल: स्वामी प्रसाद मौर्य का तीखा हमला”

बलिया के बेल्थरा रोड में राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर कड़ा बयान दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत गरीबी और कंगाली से जूझ रहा है और बड़ी आबादी का आश्रय केवल कुछ किलो चावल पर टिका हुआ है। मौर्य ने सरकार की नीतियों पर तीखी प्रतिक्रिया दी और योगी सरकार की बुलडोजर कार्रवाइयों को भी सार्वजनिक तौर पर निंदा की।

Swami Prasad Maurya

गरीबी की भयावह तस्वीर

स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने बयान में देश की समग्र गरीबी पर जोर देते हुए कहा कि 140 करोड़ की आबादी में 80 करोड़ लोग ऐसी स्थिति में हैं जिनकी जीवनयापन 5-10 किलोग्राम चावल पर निर्भर है। उन्होंने यह भी कहा कि इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश कितनी बदहाली और लाचार जिंदगी जी रहा है। मौर्य का तर्क था कि आंकड़े और असलियत अलग हैं, और रोजमर्रा की जिंदगियों की कठोर सच्चाई पर नजर छोड़ दी जाती है।

सरकार की नीतियों पर तीखा आरोप

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मौर्य ने सरकारी कदमों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार का मूल काम कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से जनता की भलाई सुनिश्चित करना है, न कि “गुंडागर्दी” और बुलडोजर से आम लोगों के घरों को गिराना। मौर्य के अनुसार, बुलडोजर चला कर घर उजाड़ना और गरीबों को बेघर करना किसी भी लोकतांत्रिक शासन की पहचान नहीं हो सकती।

बुलडोजर पर बयान और राजनीतिक दृष्टि

स्वामी प्रसाद मौर्य ने बुलडोजर कार्रवाई को सरकारी गुंडागर्दी करार दिया और कहा कि सरकार को अपनी प्राथमिकता पुनः परिभाषित करनी चाहिए। उनके शब्दों में, “सरकार का काम सरकारी गुंडागर्दी के रास्ते पर चल कर लोगों के घर गिराना, गरीबों को उजाड़ना या राजनीतिक दुर्भावना से किसी को सलाखों के पीछे भेजना नहीं है।” यह हमला सीधे तौर पर प्रशासन के इस तरीक़े पर आधारित था, जो समाज के निचले तबके पर सीधा प्रभाव डालता है।

मौर्य के वक्तव्य ने एक बार फिर देश में फैली सामाजिक-आर्थिक विषमताओं और सरकारी नीतियों के प्रभाव पर बहस छेड़ दी है। उनके आरोपों ने यह सवाल उठाया है कि क्या आर्थिक आंकड़ों के पीछे छिपी वास्तविकताओं पर सरकार और नीति निर्माताओं का ध्यान पर्याप्त है या नहीं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौर्य द्वारा उठाए गए ये बिंदु स्थानीय और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन सकते हैं।

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