प्राचीन काल की बात है, जब त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ने सृष्टि की रचना करने का विचार किया, तब ब्रह्मांड में अंधकार का राज्य था। चारों ओर सन्नाटा और अंधेरा फैला हुआ था, न कोई प्रकाश था, न जीवन की कोई झलक। यह शून्यता त्रिदेव के लिए भी चुनौती बन गई थी।
त्रिदेव ने विचार किया कि इस अंधकार में जीवन और प्रकाश लाने के लिए केवल उनकी शक्ति पर्याप्त नहीं है। तब उन्होंने मां दुर्गा से सहायता मांगी। मां दुर्गा ने अपनी दिव्य शक्ति से ब्रह्मांड के अंधकार को दूर करने का संकल्प लिया।
मां दुर्गा के आठ प्रमुख स्वरूपों में से चौथा स्वरूप था—मां कूष्मांडा। इस स्वरूप में मां दुर्गा की अद्भुत शक्ति और सौंदर्य परिलक्षित होता है। उनके मुख पर एक मधुर मुस्कान खिली हुई थी, और जैसे ही वह मुस्कुराईं, उनके मुख मंडल से दिव्य प्रकाश फैलने लगा। यह प्रकाश ब्रह्मांड के कोने-कोने में फैल गया और अंधकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगा।
मां कूष्मांडा के इस स्वरूप को देखकर त्रिदेव अत्यंत प्रसन्न हुए। उनके मुख मंडल से फैलने वाले प्रकाश ने पृथ्वी, आकाश और सभी लोकों को उज्ज्वल कर दिया। यही कारण है कि उन्हें मां कूष्मांडा कहा गया—जिनके चेहरे की मुस्कान से सृष्टि में जीवन और प्रकाश आता है।
सनातन शास्त्रों में वर्णन है कि मां कूष्मांडा सूर्य लोक में निवास करती हैं। उनके मुख मंडल में सूर्य की किरणों के समान तेज़स्विता है, और यही प्रकाश सृष्टि में ऊर्जा और जीवन का संचार करता है। उनके आठ हाथ दिव्य अस्त्रों और प्रतीकों से पूर्ण हैं, जो सृष्टि की रचना और संरक्षण में उनकी शक्ति का प्रतीक हैं।
कथा यह बताती है कि जब ब्रह्मांड में अंधकार और शून्यता फैली हुई थी, तब मां कूष्मांडा की मुस्कान और प्रकाश ने सृष्टि को जीवंत और उज्ज्वल बना दिया। उनके स्वरूप से हम यह सीख सकते हैं कि प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा की शक्ति अंधकार और कठिनाइयों को हमेशा हराने में सक्षम है।