कात्य गोत्र में जन्मे महर्षि कात्यायन ने मां भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की। उनका हृदय इस संकल्प से भरा था कि देवी उन्हें पुत्री रूप में प्राप्त हों। उनकी अटूट भक्ति और गहन साधना से प्रसन्न होकर मां भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में प्रकट हुईं। इसी कारण उन्हें कात्यायनी के नाम से जाना गया।
महर्षि कात्यायन की तपस्या
महर्षि कात्यायन का संकल्प इतना गहरा था कि उन्होंने देवी की आराधना में कोई कमी नहीं छोड़ी। तपस्या और भक्ति के इस अनवरत मार्ग ने उन्हें देवी का आशीर्वाद दिलाया। उनके घर में देवी कात्यायनी के रूप में प्रकट होने के बाद ही यह व्रत और पूजा परंपरा रूप में स्थापित हुई।
मां कात्यायनी का महत्व
मां कात्यायनी के गुण विशेष रूप से शोध और अनुसंधान कार्यों में परिलक्षित होते हैं। उनके आशीर्वाद से जटिल से जटिल कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं। आधुनिक युग में भी उनका महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। मान्यता है कि वैद्यनाथ नामक स्थान पर उनका प्रकट होना और वहां पूजा जाना उन्हें अमोघ फलदायिनी के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
ब्रजमंडल में मां कात्यायनी की पूजा
पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रज की गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की इच्छा से मां कात्यायनी की विशेष पूजा की थी। यह पूजन कालिंदी और यमुना के तट पर किया गया। तब से मां कात्यायनी को ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। उनकी कृपा से भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और जीवन में सफलता और मंगल की प्राप्ति होती है।
व्रत और श्रद्धालुओं की आस्था
कात्यायनी व्रत का पालन विशेष रूप से नवरात्रि में किया जाता है। भक्तगण इस व्रत में उपवास, विधिपूर्वक पूजा और हवन कर देवी की कृपा प्राप्त करते हैं। माना जाता है कि इस व्रत को करने से संतान सुख, घर में मंगल और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
आधुनिक युग में कात्यायनी का महत्व
आज के वैज्ञानिक और आधुनिक युग में भी मां कात्यायनी की पूजा और व्रत का महत्व कम नहीं हुआ है। शोध, शिक्षा और महत्वपूर्ण कार्यों में उनकी कृपा से सफलता मिलती है। भक्त उनकी प्रेरणा से जीवन में कठिनाइयों का सामना धैर्य और भक्ति के साथ करते हैं।
इस कथा से स्पष्ट होता है कि मां कात्यायनी न केवल देवी के रूप में पूजनीय हैं, बल्कि उनके व्रत और आशीर्वाद से जीवन में स्थिरता, सफलता और मंगल की प्राप्ति भी संभव है।