बहुत समय पूर्व महिषासुर नामक एक असुर ने कठोर तपस्या कर देवताओं से अपार शक्तियाँ प्राप्त कर ली थीं। वरदान पाकर वह अत्यंत अभिमानी हो गया और तीनों लोकों—स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—पर अपना अधिकार जमाने लगा। उसकी शक्ति और क्रूरता के सामने देवता भी परास्त होने लगे। स्वर्गलोक में हाहाकार मच गया, इंद्रासन छिन गया और सभी देवता व्याकुल होकर त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—की शरण में पहुँचे।
त्रिदेवों ने देवताओं की व्यथा सुनी और उनका क्रोध भयंकर अग्नि की तरह प्रकट हुआ। उसी दिव्य क्रोध और ऊर्जा से एक अद्भुत शक्ति का जन्म हुआ—मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप का। इनके मस्तक पर अर्धचंद्र था, जो घंटे के समान प्रतीत होता था। इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा गया।
माता का रूप अत्यंत तेजस्वी था। उनके दस हाथ थे और प्रत्येक हाथ में देवताओं द्वारा प्रदत्त दिव्य अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हो रहे थे। भगवान शिव ने अपना त्रिशूल, भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र, इंद्रदेव ने घंटा और अन्य देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियाँ माता को अर्पित कीं। देवी सिंह पर आरूढ़ हुईं, जिससे उनका रूप और भी वीर्यवान प्रतीत होने लगा।
फिर आरंभ हुआ महिषासुर और माता चंद्रघंटा के बीच भयंकर युद्ध। असुरों की विशाल सेनाएँ चारों ओर से घेरकर गर्जन करने लगीं, किंतु माता चंद्रघंटा के प्रहार से असुर सेना धराशायी हो गई। जब स्वयं महिषासुर ने सिंह रूप धारण कर माता को चुनौती दी, तब माता ने अपने त्रिशूल, चक्र और घंटा से उसे परास्त कर अंततः उसका वध कर दिया।
देवताओं ने विजय का जयघोष किया और समस्त लोकों में शांति और सुख-समृद्धि का संचार हुआ। तभी से माता के इस रूप की उपासना नवरात्रि के तीसरे दिन की जाती है।
धार्मिक मान्यता है कि मां चंद्रघंटा की कृपा से भक्त के जीवन से भय और क्लेश समाप्त होते हैं, और उनके घर-परिवार में शांति व समृद्धि का वास होता है।
👉 यह कथा हमें यह सिखाती है कि जब भी अधर्म और अन्याय बढ़ता है, तो धर्म की रक्षा के लिए देवी शक्ति सदैव प्रकट होती हैं और असुरों का संहार करती हैं।
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