वाराणसी में राष्ट्रीय स्मारक घोषित धरहरा मस्जिद (बिंदु माधव का धरहरा) पर गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगा फहराने जा रहे शिवसैनिकों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। दोपहर करीब 3 बजे मैदागिन चौराहे से तिरंगा लेकर बढ़ रहे 25 शिवसैनिकों को पुलिस ने रोककर कोतवाली थाने ले गई। शाम 5 बजे के बाद सभी को हिदायत देते हुए छोड़ा गया।
कानून-व्यवस्था का हवाला देकर रोकथाम:
हर साल की तरह इस बार भी शिवसैनिक पंचगंगा घाट स्थित धरहरा मस्जिद पर तिरंगा फहराने का प्रयास कर रहे थे। पुलिस ने उन्हें कानून-व्यवस्था के हवाले से रोकते हुए हिरासत में लिया। शिवसैनिकों का कहना है कि यह स्मारक राष्ट्रीय महत्व का है, इसलिए प्रशासन का कोई व्यक्ति ही यहां तिरंगा फहरा दे।
1995 से लगातार प्रयास:
शिवसैनिक साल 1995 से लगातार बिंदु माधव के धरहरा में झंडा फहराने की कोशिश कर रहे हैं। हर वर्ष पुलिस की रोकथाम के कारण उनका प्रयास असफल रहा। इस बार भी भारी पुलिस बल और आरआरएफ के जवानों ने मैदागिन चौराहे से आगे बढ़ने पर उन्हें रोक दिया।

बिंदु माधव का इतिहास:
इतिहासकार डॉ. मोतीचंद्र के अनुसार, 1669 में औरंगजेब के फरमान से विश्वनाथ मंदिर के साथ बिंदुमाधव मंदिर भी नष्ट कर दिया गया था। यह मंदिर पंचगंगा घाट से रामघाट तक फैला हुआ था और इसके परिसर में पुजारियों के आवास और अन्य मंदिर भी शामिल थे।
मत्स्य पुराण और धार्मिक महत्व:
मत्स्य पुराण में बिंदुमाधव मंदिर को तीर्थ स्थल के रूप में उल्लेख किया गया है। पंचगंगा घाट पर पांच नदियों – गंगा, यमुना, विशाखा, धूतपापा और किरणा – का संगम होने के कारण कार्तिक महीने में स्नान और दर्शन-पूजन की परंपरा रही है। रामानंदाचार्य परंपरा की मूल पीठ श्रीमठ भी यहीं स्थित है।
तुलसीदास और मराठा शासक का योगदान:
गोस्वामी तुलसीदास ने बिंदुमाधव मंदिर के विग्रह के सामने बैठकर मंदिर की महिमा का उल्लेख किया। 1669 में मंदिर टूटने के बाद 1672 में छत्रपति शिवाजी ने वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया। 19वीं सदी में मराठा शासक भवन राव ने इसे सुंदरीकरण प्रदान किया।
एएसआई के संरक्षण में:
1932 से एएसआई के संरक्षण में आने के बाद धरहरा मस्जिद और बिंदुमाधव मंदिर की मूल वास्तुकला का संरक्षण किया गया। जीर्णोद्धार कार्य से इसकी ऐतिहासिक संरचना को बनाए रखा गया। किंवदंती के अनुसार, दिल्ली का कुतुब मीनार भी कभी इस मस्जिद की मीनारों से दिखाई देता था।
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