बिना हाथों के तीरंदाज… कर दिखाया कमाल!

भारत की बेटी शीतल देवी (Sheetal Devi) आज पूरे देश के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। जन्म से फोकोमेलिया (Phocomelia) नामक दुर्लभ बीमारी से जूझने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। दोनों हाथ न होने के बावजूद मात्र 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने वह कर दिखाया जो असंभव-सा लगता है। शीतल देश की पहली पैरा तीरंदाज (Para Archer) हैं जिन्हें अब भारत की सामान्य तीरंदाज टीम में शामिल किया गया है। यह उपलब्धि न सिर्फ उनके साहस की मिसाल है, बल्कि देश के खेल इतिहास में भी एक नया अध्याय जोड़ती है।
फोकोमेलिया बीमारी के बावजूद अटूट हौसला:
शीतल देवी जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) की रहने वाली हैं। जन्म से ही उन्हें फोकोमेलिया नामक दुर्लभ बीमारी थी, जिसमें व्यक्ति के हाथ-पैर सामान्य से बहुत छोटे रह जाते हैं। शीतल के दोनों हाथ नहीं हैं, फिर भी उन्होंने कभी खुद को सीमित नहीं माना। उन्होंने अपने पैरों की मदद से तीरंदाजी सीखी और धीरे-धीरे उस मुकाम पर पहुंचीं जहां आज पूरा देश उन्हें सलाम कर रहा है।
अकल्पनीय उपलब्धि, सामान्य टीम में हुआ चयन:
शीतल ने हाल ही में एक असाधारण उपलब्धि हासिल की है। बिना बाजुओं वाली इस तीरंदाज को भारत की सामान्य तीरंदाज टीम में शामिल किया गया है। यानी अब वह उन खिलाड़ियों के साथ मुकाबला करेंगी जिनके पास भुजाएँ हैं। यह निर्णय भारतीय तीरंदाजी इतिहास के लिए ऐतिहासिक है क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी पैरा खिलाड़ी को सामान्य श्रेणी की टीम में स्थान मिला है।
पेरिस पैरालंपिक में किया कमाल:
शीतल देवी ने पेरिस पैरालंपिक (Paris Paralympic) में मिश्रित टीम स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया था। उनकी यह जीत न केवल भारत के लिए गर्व का क्षण थी बल्कि यह साबित करती है कि सीमाएँ केवल शरीर की नहीं, बल्कि सोच की होती हैं। इससे पहले उन्होंने चीन (China) में आयोजित 2023 एशियन पैरा गेम्स (Asian Para Games) में एक ही सीजन में दो स्वर्ण पदक जीतकर सबको चौंका दिया था।
जूनियर एशिया कप में भी बनाएंगी नया रिकॉर्ड:
शीतल को जेद्दा (Jeddah) में होने वाले एशिया कप स्टेज-3 (Asia Cup Stage-3) के लिए जूनियर कंपाउंड भारतीय टीम में चुना गया है। यह भारत के इतिहास में पहला मौका होगा जब कोई पैरा तीरंदाज जूनियर एशिया कप में सामान्य तीरंदाजों के साथ मैदान में उतरेगा। यह चयन न केवल शीतल के लिए सम्मान की बात है, बल्कि यह पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
तुर्किये के पैरा तीरंदाज से मिली प्रेरणा:
शीतल शुरू से ही सामान्य तीरंदाजों के साथ मुकाबला करने की इच्छा रखती थीं, लेकिन उन्हें वास्तविक प्रेरणा तुर्किये (Turkey) के पैरा तीरंदाज ओजनुर क्योर गिर्डी (Oznur Cyor Girdi) से मिली। गिर्डी ने पेरिस पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीता था और वे सामान्य तीरंदाजों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करते हैं। शीतल ने उनका प्रदर्शन देखा और उसी क्षण ठान लिया कि वह भी इसी स्तर तक पहुंचेंगी।
मेहनत और लगन से मिली सफलता:
ओजनुर गिर्डी से प्रेरित होकर शीतल ने कठिन मेहनत की। उनके लिए हर अभ्यास एक नई चुनौती थी, लेकिन उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी तकनीक और एकाग्रता को इस स्तर तक पहुंचाया कि आज वे सामान्य तीरंदाजों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। उनका सफर यह साबित करता है कि असली जीत शरीर से नहीं, बल्कि मन के दृढ़ निश्चय से होती है।
अर्जुन पुरस्कार से हुई सम्मानित:
शीतल देवी को उनकी असाधारण उपलब्धियों के लिए अर्जुन पुरस्कार (Arjuna Award) से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उनके अटूट साहस और खेल के प्रति समर्पण का प्रतीक है। वह आज देश के हर युवा के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, जो किसी भी परिस्थिति में अपने सपनों को साकार करने का हौसला रखता है।

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डिस्क्लेमर: यह खबर स्थानीय संवाददाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है।

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