सनातन मान्यताओं के अनुसार, शारदीय नवरात्र का अत्यधिक महत्व है और यह नौ रातों और दस दिनों का एक प्रमुख हिंदू त्योहार है जो देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा के लिए समर्पित है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
शारदीय नवरात्र का महत्व:
शारदीय नवरात्र का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह देवी दुर्गा और महिषासुर नामक राक्षस के बीच हुए युद्ध का स्मरण कराता है। इस युद्ध में देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध करके धर्म की रक्षा की थी। यह त्योहार शक्ति, समृद्धि और ज्ञान की देवी के रूप में दुर्गा की पूजा का प्रतीक है।
शारदीय नवरात्र क्यों मनाया जाता है:
* बुराई पर अच्छाई की जीत: यह त्योहार देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध की याद दिलाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
* शक्ति की पूजा: नवरात्र के दौरान देवी दुर्गा के नौ रूपों (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री) की पूजा की जाती है। इन नौ रूपों में से प्रत्येक शक्ति और गुणों का प्रतिनिधित्व करता है।
* ऋतु परिवर्तन: यह त्योहार शरद ऋतु की शुरुआत का भी प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस समय देवी पृथ्वी पर आती हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देती हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, “आप सभी को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं। भक्ति, साहस, संयम और संकल्प से परिपूर्ण यह पावन पर्व सभी के जीवन में नई शक्ति और नया विश्वास लेकर आए। जय माता दी!”
पंचांग के अनुसार 9 दिनों में पूजा विधि
पंचांग के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। पूजा की सामान्य विधि इस प्रकार है:
1. घटस्थापना (पहले दिन): शुभ मुहूर्त में कलश की स्थापना करें। कलश में जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का, अक्षत, और हल्दी डालकर मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखें और ऊपर नारियल रखें।
2. दैनिक पूजा: प्रतिदिन मां दुर्गा के नौ रूपों में से एक की पूजा करें। प्रत्येक दिन के लिए विशेष मंत्र, भोग और रंग निर्धारित होते हैं।
3. अखंड ज्योति: नौ दिनों तक अखंड ज्योति जलाना शुभ माना जाता है।
4. पाठ: दुर्गा सप्तशती, देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र का पाठ करें।
5. व्रत: भक्त नौ दिनों तक व्रत रखते हैं और नवमी या दशमी के दिन हवन के बाद उपवास खोलते हैं।
6. कन्या पूजन: अष्टमी या नवमी तिथि पर कन्या पूजन का विधान है। 2 से 9 कन्याओं और एक बटुक (छोटा लड़का) को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद लें।
7. हवन और विसर्जन: नवमी तिथि पर हवन कर पूजा का समापन करें।
घटस्थापना का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, आज, 22 सितंबर 2025 को शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा के साथ घटस्थापना का शुभ कार्य संपन्न होगा। कलश स्थापना का प्रथम मुहूर्त प्रातः 6 बजकर 9 मिनट से 8 बजकर 6 मिनट तक रहा, जिसकी कुल अवधि 1 घंटा 56 मिनट थी। इसके पश्चात, दूसरा शुभ मुहूर्त मध्याह्न 11 बजकर 49 मिनट से 12 बजकर 38 मिनट तक रहेगा। इस शुभ वेला में विधि-विधान से घटस्थापना कर मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करें।
सरल एवं पूर्ण पूजा विधि का अनुष्ठान
सबसे पहले, प्रातःकाल के मंगलमय वेला में, पवित्र जल से स्नान कर शुद्धता धारण करें और पवित्रता के प्रतीक स्वच्छ वस्त्रों से स्वयं को आच्छादित करें। इसके उपरांत, अपने पूजा स्थल को देवत्व का स्पर्श देते हुए गंगाजल से प्रोक्षित करें, जिससे वह स्थान दिव्य ऊर्जा से ओत-प्रोत हो जाए।
एक पावन लकड़ी की चौकी को मां की चौकी बनाएं और उस पर लाल रंग का आसन बिछाएं, जो शक्ति का प्रतीक है। इस आसन पर श्रद्धापूर्वक मां दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र को स्थापित करें, मानों आप साक्षात देवी को अपने हृदय में बिठा रहे हों।
अब, एक मिट्टी के पात्र में जौ के दाने बोएं, जो सृष्टि के अंकुरण का प्रतीक हैं। इस पात्र के ऊपर, पूर्णता के प्रतीक जल से भरे हुए कलश को स्थापित करें। इस कलश को कल्याणकारी स्वास्तिक से सुशोभित करें और उस पर रक्षा सूत्र (कलावा) बांधें। कलश में सुपारी, एक सिक्का, अक्षत और आम के पवित्र पत्ते अर्पित करें। अंत में, एक नारियल को चुनरी से आवेष्टित कर उसे कलश के मुख पर स्थापित करें। यह नारियल ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार, आप देवी के आह्वान के लिए एक पवित्र वातावरण का निर्माण करते हैं।
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