उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के सभी जिलों में महिला एवं बाल विकास विभाग (Women and Child Development Department) द्वारा मिशन शक्ति (Mission Shakti) के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय बालिका सप्ताह की थीम पर “बाल विवाह को ना” विषयक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह आयोजन न केवल सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हुआ, बल्कि बालिकाओं और महिलाओं को आत्मनिर्भरता एवं अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने का सशक्त माध्यम भी बना। इस अवसर पर उन बालिकाओं को सम्मानित किया गया, जिन्होंने सामाजिक दबाव के बावजूद बाल विवाह से इनकार कर शिक्षा और स्वाभिमान का रास्ता चुना।
बाल विवाह के खिलाफ जन-जागरूकता का मंच:
प्रदेश के विभिन्न जिलों में आयोजित कार्यक्रमों में सामुदायिक संवाद, नाटक, गोष्ठियाँ, वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ और व्याख्यानों के माध्यम से बाल विवाह के दुष्परिणामों पर चर्चा की गई। समाजसेवियों, शिक्षकों, विशेषज्ञों और बालिकाओं ने इस विषय पर खुलकर अपने विचार रखे और समाज से बाल विवाह जैसी कुप्रथा को समाप्त करने का आह्वान किया।
विभाग की बड़ी उपलब्धि:
महिला एवं बाल विकास विभाग ने पिछले पाँच वर्षों में 2000 से अधिक संभावित बाल विवाहों को रुकवाया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) 2019-21 के अनुसार, उत्तर प्रदेश में अब भी लगभग 15-18 प्रतिशत बालिकाओं का विवाह 18 वर्ष से कम आयु में हो जाता है। प्रदेश का औसत 15.8 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 23.3 से कम है। इसके बावजूद राज्य सरकार वर्ष 2030 तक बाल विवाह मुक्त प्रदेश बनाने के लक्ष्य पर कार्य कर रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण:
ग्रामीण इलाकों में बाल विवाह की समस्या अपेक्षाकृत अधिक है। यद्यपि सरकारी और सामाजिक प्रयासों से इसमें कमी आई है, लेकिन यह समस्या अब भी गंभीर है। कार्यक्रमों के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि इस कुप्रथा के विरुद्ध जागरूकता, सामूहिक प्रयास और शिक्षा का विस्तार ही स्थायी समाधान हो सकता है।
स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभावों पर चर्चा:
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने बाल विवाह से जुड़ी स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक समस्याओं को विस्तार से बताया। कम उम्र में विवाह होने से बालिकाओं की शिक्षा बाधित होती है, जिससे उनके करियर और आत्मनिर्भरता की संभावनाएँ सीमित हो जाती हैं। किशोरावस्था में मातृत्व से मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में वृद्धि होती है। साथ ही, कम आयु में विवाह होने से घरेलू हिंसा और शोषण की संभावना भी बढ़ जाती है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि बाल विवाह समाज की सामाजिक और आर्थिक प्रगति में बाधक है।
साहसिक बालिकाओं को किया गया सम्मानित:
“बाल विवाह को ना” कार्यक्रम का सबसे भावनात्मक क्षण वह था जब उन बालिकाओं को मंच पर सम्मानित किया गया जिन्होंने सामाजिक दबावों के बावजूद बाल विवाह से इनकार किया। इन बालिकाओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने शिक्षा और आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दी। उनके साहस ने उपस्थित जनसमूह को प्रेरित किया और यह संदेश दिया कि हर बालिका को अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने का अधिकार है।
कानूनी प्रावधान और सरकार की प्रतिबद्धता:
कार्यक्रम में यह जानकारी दी गई कि भारत सरकार (Government of India) द्वारा बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 लागू किया गया है, जिसके तहत बाल विवाह कराना, करवाना या उसमें भाग लेना दंडनीय अपराध है। इस अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रदेश में जिला प्रोबेशन अधिकारियों को बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी नियुक्त किया गया है।
लीना जोहरी का संदेश:
उत्तर प्रदेश की अपर मुख्य सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग, लीना जोहरी (Leena Johri) ने कहा कि “बाल विवाह केवल एक सामाजिक कुरीति नहीं, बल्कि यह बालिकाओं के अधिकारों का उल्लंघन है। सरकार शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण के माध्यम से बालिकाओं को मजबूत बनाने के लिए संकल्पित है। समाज के सामूहिक प्रयास से ही इस कुप्रथा का अंत संभव है। आज बालिकाओं ने जिस साहस से अपनी आवाज बुलंद की है, वही आने वाले उत्तर प्रदेश की दिशा तय करेगा।”
बालिका सप्ताह में जागरूकता का संकल्प:
अंतर्राष्ट्रीय बालिका सप्ताह (3 से 11 अक्टूबर) के अंतर्गत आयोजित “बाल विवाह को ना” कार्यक्रम का उद्देश्य बालिकाओं को अधिकार-संपन्न बनाना और समाज में जागरूकता फैलाना है। विशेषज्ञों का मत है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में मानसिकता में बदलाव और परिवार स्तर पर संवाद भी आवश्यक है।
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‘बाल विवाह को ना’ अभियान से गूंजा प्रदेश, मिशन शक्ति के तहत बालिकाओं ने दिखाया साहस

