February 24, 2026

संघ को सता रही यूजीसी से बंटवारे की चिंता:2027 चुनाव से पहले यूपी में भागवत का बड़ा संदेश क्या?

लखनऊ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) का उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यूजीसी नियमों को लेकर समाज में बढ़ती अगड़ा-पिछड़ा-दलित दूरी और 2027 के संभावित राजनीतिक प्रभावों के बीच भागवत ने गोरखपुर (Gorakhpur), लखनऊ (Lucknow) और मेरठ (Meerut) में सामाजिक सद्भाव बैठकों तथा प्रबुद्धजन सम्मेलनों के माध्यम से एकता का संदेश दिया। उन्होंने सनातन समाज से जातिगत विभाजन से ऊपर उठकर राष्ट्र और धर्म के आधार पर एकजुट रहने का आह्वान किया।

शताब्दी वर्ष में प्रांतों का प्रवास:
संघ प्रमुख शताब्दी वर्ष के दौरान विभिन्न प्रांतों में दो से तीन दिन का प्रवास कर रहे हैं। इससे पहले काशी, बृज और कानपुर प्रांत में कार्यक्रम हो चुके थे। इस क्रम में गोरखपुर, लखनऊ और पश्चिम क्षेत्र के मेरठ प्रांत में उन्होंने प्रवास किया। इन प्रवासों के दौरान सामाजिक सद्भाव बैठकें आयोजित की गईं, जिनमें विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि और सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी शामिल हुए। कुटुंब मिलन कार्यक्रमों में संघ और अनुषांगिक संगठनों के पदाधिकारियों तथा उनके परिवारों से संवाद किया गया। युवा और प्रबुद्धजन सम्मेलनों के जरिए युवाओं और समाज के प्रभावशाली वर्ग तक संदेश पहुंचाने का प्रयास हुआ।

यूजीसी मुद्दे पर दो अहम बयान:
यूजीसी कानून को लेकर संघ की चिंता भागवत के दो बयानों में झलकती है। लखनऊ प्रवास के पहले दिन दिए गए वक्तव्य पर सोशल मीडिया में कुछ वर्गों की प्रतिक्रिया देखने को मिली। इसके बाद अगले दिन इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान (Indira Gandhi Pratishthan) में आयोजित प्रबुद्धजन सम्मेलन में उन्होंने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में विचाराधीन है और कानून सभी को मानना चाहिए। यदि कानून में त्रुटि है तो उसे संवैधानिक प्रक्रिया से बदला जा सकता है।

उन्होंने कहा कि जातियां झगड़े का कारण नहीं बननी चाहिएं। समाज में अपनेपन का भाव होगा तो समस्याएं स्वतः कम होंगी। जो पीछे रह गए हैं, उन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास होना चाहिए। संघर्ष नहीं, समन्वय से समाज आगे बढ़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि सद्भाव के अभाव में भेदभाव पनपता है, जबकि सनातन विचारधारा मूल रूप से सद्भाव और एकात्मता की विचारधारा है।

जाति की राजनीति पर टिप्पणी:
प्रबुद्धजन सम्मेलन में भागवत ने बिना किसी दल का नाम लिए जाति आधारित राजनीति पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अनेक जाति-पंथ की बजाय अपनी पहचान हिंदू के रूप में स्वीकार करनी चाहिए। संघ में जाति नहीं पूछी जाती, सभी सहोदर माने जाते हैं। समाज से जातिगत विभाजन समाप्त करने के लिए उसे महत्व देना बंद करना होगा। उनका कहना था कि जिस दिन समाज जाति-पाति को प्राथमिकता देना छोड़ देगा, उसी दिन जाति आधारित राजनीति का प्रभाव भी घटेगा।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय:
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संघ प्रमुख का संदेश सामाजिक एकजुटता पर केंद्रित रहा। कुछ विश्लेषक इसे आगामी चुनावी परिदृश्य से जोड़कर भी देख रहे हैं। उनका कहना है कि यदि समाज में वर्गीय दूरी बढ़ती है तो उसका राजनीतिक प्रभाव भी पड़ सकता है। ऐसे में संघ की पहल सामाजिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक प्रयास मानी जा रही है।

युवा वर्ग और सामाजिक समीकरण:
यूजीसी नियमों को लेकर युवाओं के बीच जो बहस छिड़ी है, उसने सामाजिक वर्गों के बीच संवाद की आवश्यकता को रेखांकित किया है। भागवत के संबोधनों में यह संकेत रहा कि समाज को विभाजन की बजाय समन्वय का मार्ग अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी एक मातृभूमि के पुत्र हैं और मनुष्य होने के नाते समान हैं।

निष्कर्ष:
संघ प्रमुख का उत्तर प्रदेश प्रवास सामाजिक सद्भाव और एकात्मता के संदेश पर केंद्रित रहा। यूजीसी मुद्दे और संभावित राजनीतिक असर के बीच उनका जोर इस बात पर रहा कि समाज में विभाजन न हो और सामूहिक पहचान को प्राथमिकता मिले।

Disclaimer:
यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है। यदि कोई आपत्ति है या खबर से संबंधित कोई सूचना देने या अपना पक्ष रखने के लिए हमें ईमेल करें: apnabharattimes@gmail.com



Tags (#): #RSS #Mohan_Bhagwat #Uttar_Pradesh #UGC #Social_Harmony #Politics

Related Post

Leave a Reply

Discover more from Apna Bharat Times

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading