योगी सरकार 2.0 का प्रथम वर्ष पूरा। लेकिन विपक्ष कहां है?

इस अंधकार रूपी समाज में एक हल्की सी रोशनी आती है उस रोशनी में कुछ किताब के पन्ने पलटते हुए दिखाई देते हैं उस किताब में कुछ सवालों के जवाब ढूंढने जाते हैं मन में सवाल तो बहुत है जो कि गाजीपुर को लेकर चिंता होती है जी हां उत्तर प्रदेश का जनपद गाजीपुर यूं तो चिंता प्रदेश और देश को लेकर भी है लेकिन जब अपने आस-पास का समाज विकसित और आधुनिक हो जाए तो देश और प्रदेश की बड़ी समस्याओं से लड़ने की ताकत खुद-ब-खुद अंदर आ जाती है।

विवादित भाषणों की आवाज के बीच मन में कई सवाल पैदा होते हैं।

सवाल की गाजीपुर में एक भी इंडस्ट्री नहीं है चीनी मिल खुल जाता तो रोजगार के कितने साधन आ जाते हैं। पटेल आयोग से बना यह चीनी मिल सत्ता की लापरवाही में कब बंद हो गया यह पता ही ना चला 1999 के बाद वादे 2014 में भी किए गए और 2019 में भी लेकिन कहीं यह चीनी मिल कई वर्षों का इंतजार ना करवा दे।

भले ही हजारों की संख्या में आम जनमानस किसान बेरोजगार अपनी समस्याओं अपनी जमीन अपने हक के लिए सालों से कोर्ट के चक्कर काट रहा हो लेकिन इस बीच बड़े-बड़े राजनीतिक शख्सियत और कथित बाहुबलियों के ऊपर कसते कानूनी शिकंजे की आवाज के बीच मन में कई सवाल आते हैं।

काश प्राइवेट स्कूल के अध्यापकों की तरह सरकारी स्कूल के अध्यापकों की भी तनख्वाह होती तो सरकार के राजस्व में बचत होता और सरकारी स्कूल भी प्राइवेट स्कूल से बेहतर सुविधा दे पाते। कई वर्ष बीत गए कई वादे हुए लेकिन यह सपना अब तक पूरा ना हो सका।

कुछ छोटे व्यापारियों आत्मनिर्भर से निर्भर बनाने और भू माफियाओं को भूमिहीन बनाने की प्रक्रिया में गरजते बुलडोजर की आवाज के बीच कई सवाल मन में आते हैं।

काश कि गाजीपुर की खाली सरकारी जमीनों पर स्ट्रीट फूड मार्केट लगा दिया जाता है तो गाजीपुर शहर में अतिक्रमण ना होता है गाजीपुर शहर की सड़कों पर छोटे-छोटे डिवाइडर बन जाते तो जाम की समस्याओं से निजात मिल जाता है यह सब करने में कितना खर्चा आता है सब प्रबंधन का ही तो कमाल है क्या सत्ता पक्ष या विपक्ष के नेता इतना भी नहीं कर पाते?

सवालों पर गीत लिखकर गीत गाने वाले को मिलते नोटिस और उस नोटिस से उठते सवालों के बीच एक आवाज आती है।

आवाज उत्तर प्रदेश के राज्य मंत्री रविंद्र जयसवाल की थी जो कहते हैं की जनता को जानने का हक है कि सत्ता में जिस को जनता ने बैठाया उस ने जनता के लिए क्या किया?

दरअसल राज्य मंत्री रविंद्र जायसवाल योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष की सफलता को दिलवा रहे थे उन्होंने एक पुस्तक दिखाई और कहा कि इस पुस्तक में वह सारी चीजें लिखी हुई हैं वह सारी योजनाएं लिखी हुई हैं जो सरकार ने जनता के लिए किया है। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष के पास वह चश्मा नहीं है जिससे यह किताब वह पढ़ें शायद उनका कहना भी सही था क्योंकि गाजीपुर का विपक्ष कहीं नींद में सो गया है विधायक होने के नाते उन्हें तनख्वाह तो मिल जाती है उनकी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में डीजल या पेट्रोल भी पड़ जाता है लेकिन जनता के हक्का पेट्रोल कहां उड़ जाता है इसका जवाब तो यह जीते हुए विपक्ष के विधायकों के पास भी नहीं है है तो बस एक चीज कि हम सत्ता में नहीं है। राजनीति का मतलब होता है जनता के लिए समर्पित हो जाना माना कि विपक्ष के नेता है सत्ता में नहीं है लेकिन तनख्वाह तो मिलती है विधायक निधि तो मिलता है तो उसका सदुपयोग क्यों नहीं होता छोड़ दी उस तनखा को कर दें जनता के ऊपर निछावर। कम से कम गाजीपुर में खाली जमीनों पर स्ट्रीट फूड मार्केट लगवा दें ताकि गाजीपुर शहर से अतिक्रमण कम हो जाए। ईट और सीमेंट का प्रयोग करके गाजीपुर शहर की सड़कों पर छोटे-छोटे डिवाइडर बना दें ताकि जाम की समस्याओं का समाधान मिल जाए या यह भी नहीं कर सकते वो।

इस बीच एक हल्की सी आवाज सुनाई देती है संभल कर बोलो। सवाल तो बोलने का ही है सवाल तो बोलने की आजादी का ही है। मैं भी भारतीय संविधान कि किताब में बोलने की आजादी की परिभाषा को समझ रहा हूं आप भी समझने की कोशिश करिए। फिर मिलेंगे।।

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