शादी का झूठा वादा कर सहमति से संबंध बनाना अपराध नही, इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला

नोएडा की एक युवती ने जोधपुर में LLM की पढ़ाई के लिए कॉलेज में दाखिला लिया। पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात एक युवक से हुई। दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई और फिर यह रिश्ता धीरे-धीरे प्रेम में बदल गया। आपसी सहमति से दोनों साथ रहने लगे और इस दौरान शारीरिक संबंध भी बने। बाद में किसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हुआ और रिश्ता टूट गया। इसके बाद युवती ने युवक के खिलाफ शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया।

मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) पहुंचा। अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं। युवक ने आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि दोनों के बीच रिश्ता पूरी तरह आपसी सहमति से था और शादी को लेकर भी गंभीर प्रयास किए गए थे। कोर्ट ने तथ्यों और रिकॉर्ड को देखने के बाद युवती के दुष्कर्म के आरोप को खारिज कर दिया। यह फैसला ऐसे कई मामलों की कड़ी में एक अहम टिप्पणी माना जा रहा है, जिसमें कोर्ट ने शादी के झांसे और सहमति से बने संबंधों के बीच फर्क स्पष्ट किया है।

एफआईआर और आरोपों की पृष्ठभूमि:
युवती ने 12 फरवरी 2024 को नोएडा (Noida) में एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप लगाया गया कि उसे धमकाया गया, हमला किया गया और शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाए गए। एफआईआर में धारा-69 का हवाला दिया गया, जो शादी के झांसे से जुड़े मामलों में लागू होती है। आरोपी पक्ष ने इन आरोपों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।

कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें:
इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह मामला जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस अब्दुल शाहिद की बेंच के सामने आया। आरोपी युवक की ओर से बताया गया कि जून 2023 में दोनों की सगाई हो चुकी थी। इसके बाद 12 नवंबर 2024 को शादी की तारीख तय की गई थी। शादी के लिए होटल बुक किया गया, कार्ड छपवाए गए और फोटोग्राफर तक तय कर लिया गया था। लेकिन आखिरी समय में आपसी मतभेद के कारण रिश्ता टूट गया। युवक का कहना था कि शुरुआत से ही उसका इरादा शादी का था और कहीं भी धोखे का सवाल नहीं उठता।

धारा-69 पर हाईकोर्ट की टिप्पणी:
कोर्ट ने धारा-69 की व्याख्या करते हुए कहा कि यह अपराध तभी बनता है, जब यह साबित हो कि पुरुष का शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं था और उसने झूठे वादे के आधार पर शारीरिक संबंध बनाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक रिश्ता रहा, सगाई हुई और शादी की तैयारियां की गईं, तो इसे झूठा वादा नहीं माना जा सकता। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने धारा-69 के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। हालांकि, धमकी और हमले से जुड़े आरोपों की जांच जारी रखने के निर्देश दिए गए।

सहमति से बने संबंध और आरोपों पर सख्ती:
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि सहमति से बने शारीरिक संबंधों को बाद में दुष्कर्म का रूप देना कानून की भावना के अनुरूप नहीं है। ऐसे मामलों में परिस्थितियों और दोनों पक्षों के आचरण का गहराई से मूल्यांकन जरूरी है। अदालत ने कहा कि हर टूटे रिश्ते को आपराधिक रंग देना उचित नहीं है।

नोएडा का दूसरा मामला, कोर्ट की कड़ी टिप्पणी:
इसी तरह का एक और मामला नोएडा (Noida) से सामने आया था, जिसमें कोर्ट ने और भी सख्त टिप्पणी की थी। 23 सितंबर 2024 को नोएडा की एक यूनिवर्सिटी की एमए छात्रा ने सेक्टर-126 थाने में दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराया था। छात्रा का आरोप था कि वह दोस्तों के साथ हौज खास (Hauz Khas) के एक बार में पार्टी करने गई थी। देर रात नशे की हालत में वह एक युवक के साथ चली गई, जिसने गुरुग्राम (Gurugram) के एक फ्लैट में उसके साथ दुष्कर्म किया।

कोर्ट का विश्लेषण और जमानत:
मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां आरोपी की ओर से दलील दी गई कि युवती बालिग थी, अपनी मर्जी से पार्टी में गई, शराब पी और देर रात तक साथ रही। इन तथ्यों के आधार पर इसे सहमति से बना संबंध बताया गया। जस्टिस संजय सिंह ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पीड़िता एमए की छात्रा है और परिस्थितियों को समझने में सक्षम थी। कोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता के ही आरोपों को सही माना जाए, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि उसने खुद जोखिम उठाया। मेडिकल रिपोर्ट में भी जबरदस्ती के स्पष्ट संकेत नहीं मिले। इसके बाद आरोपी को जमानत दे दी गई।

न्यायिक दृष्टिकोण और संदेश:
इन फैसलों के जरिए हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि सहमति, परिपक्वता और परिस्थितियों की अनदेखी कर किसी भी रिश्ते को आपराधिक रंग देना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट का मानना है कि कानून का दुरुपयोग रोकना भी उतना ही जरूरी है, जितना पीड़ितों को न्याय दिलाना।


Tags: #HighCourt #Consent #MarriagePromise #Law

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