वाराणसी (Varanasi): भारत में हर त्यौहार दो अलग-अलग तिथियों पर मनाया जाना अब आम बात हो गई है। चाहे होली हो, दिवाली, कृष्ण जन्माष्टमी या नवरात्र—हर पर्व के शुभ मुहूर्त पर संशय बना रहता है। इसका कारण चंद्र कैलेंडर और पंचांगों की गणना में अंतर बताया जाता है। इसी विषय पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में एक महत्वपूर्ण सेमिनार आयोजित हुआ, जिसमें एक देश, एक तिथि और एक पंचांग की अवधारणा पर गहन चर्चा की गई।
त्योहारों की अलग-अलग तिथि का कारण:
त्योहारों की तिथि में अंतर मुख्यतः दो कारणों से होता है। पहला, देश में प्रयुक्त चंद्र कैलेंडर और विभिन्न पंचांगों की गणना में अंतर। दूसरा, सूर्योदय और सूर्यास्त की भौगोलिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग टाइमिंग। इसी वजह से एक ही त्यौहार अलग-अलग स्थानों पर भिन्न तिथियों में मनाया जाता है।
BHU में हुआ सेमिनार:
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में 14 अक्टूबर को एक विशेष सेमिनार आयोजित किया गया। इस आयोजन में मां शारदा ज्योतिषधाम अनुसंधान संस्थान (Indore) मेजबान की भूमिका में रहा। सेमिनार में भारत के 15 राज्यों से ज्योतिषाचार्य शामिल हुए, साथ ही नेपाल, सिंगापुर और दुबई से भी विशेषज्ञों ने भाग लिया। इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य पंचांगों की एकरूपता और धार्मिक तिथियों में समरसता लाने के उपायों पर विचार-विमर्श करना था।
शोधार्थियों का सर्वे और सवाल:
सेमिनार के दौरान BHU के शोधार्थियों ने लगभग 200 ज्योतिषाचार्यों के बीच एक सर्वे किया। सर्वे में दो अहम सवाल पूछे गए —
- क्या भारत में “एक देश, एक तिथि, एक पंचांग” की व्यवस्था संभव है?
- क्या चंद्र कैलेंडर और पंचांग गणना के अंतर को समाप्त किया जा सकता है?
इन सवालों पर ज्योतिषाचार्यों ने अपने-अपने अनुभव और शोध के आधार पर विचार रखे। कई विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी प्रगति और एक मानक गणना पद्धति अपनाकर इस दिशा में काम किया जा सकता है।
धार्मिक समरसता की दिशा में पहल:
BHU की यह पहल भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक एकरूपता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। यदि सभी पंचांगों को एक सूत्र में बांधने की व्यवस्था बन सके, तो देशभर में त्योहार एक ही दिन मनाने की परंपरा स्थापित हो सकती है। यह न केवल धार्मिक समरसता को मजबूत करेगा, बल्कि समाज में एकता और सद्भाव का संदेश भी देगा।
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