नई दिल्ली।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति और कूटनीति में एक नाम लगातार सबसे अहम भूमिका निभाता है—अजीत डोभाल। 80 वर्ष की उम्र में भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) डोभाल की सक्रियता, उनकी गहरी रणनीतिक सोच और अंतरराष्ट्रीय नेताओं से सीधे संवाद की क्षमता भारत की विदेश नीति और सुरक्षा नीति का मजबूत आधार है।
7 अगस्त का दिन इसका ताज़ा उदाहरण है। जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत पर लगातार हमलावर थे—कभी सीजफायर मुद्दे पर तो कभी टैरिफ पर—तभी अचानक डोभाल का रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मुलाकात का वीडियो सामने आता है। वैश्विक स्तर पर भारत की कूटनीतिक छवि बदलने लगती है। कुछ ही दिन बाद डोभाल ही यह ऐलान करते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी इसी महीने चीन का दौरा करेंगे।
इस घटनाक्रम ने फिर साबित कर दिया कि क्यों मोदी डोभाल पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं और क्यों उन्हें भारत की सुरक्षा और विदेश नीति का “रणनीतिक चाणक्य” कहा जाता है।

अजीत डोभाल: जासूसी से रणनीति तक का सफर
- अजीत डोभाल भारतीय खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के डायरेक्टर रह चुके हैं।
- वे मिजोरम, पंजाब और कश्मीर में आतंकवाद-रोधी अभियानों का हिस्सा रहे।
- 1980-90 के दशक में उन्हें “सुपर स्पाई” कहा जाता था, क्योंकि वे दुश्मन इलाकों में रहकर गुप्त जानकारी जुटाते थे।
- उनकी इसी पृष्ठभूमि ने उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद चेहरा बना दिया।
क्यों मोदी रखते हैं उन पर भरोसा?
1. रणनीतिक सोच का कमाल
डोभाल न केवल खुफिया मामलों के जानकार हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की गहरी समझ भी रखते हैं। यही वजह है कि पीएम मोदी अक्सर संवेदनशील विदेश नीति के फैसले उन्हीं से ड्राफ्ट करवाते हैं।
2. सीधे संवाद की कला
डोभाल की खासियत यह है कि वे वैश्विक नेताओं से बिना किसी हिचक के सीधे बात कर सकते हैं। चाहे रूस के पुतिन हों, चीन के शी जिनपिंग हों या अमेरिका के सुरक्षा अधिकारी—सभी से उनका संवाद मजबूत और भरोसेमंद माना जाता है।
3. संवेदनशील घटनाओं में निर्णायक भूमिका
- उरी हमला (2016) और उसके बाद की सर्जिकल स्ट्राइक की रणनीति में डोभाल का अहम योगदान था।
- पुलवामा हमला (2019) के बाद बालाकोट एयरस्ट्राइक में भी उनकी भूमिका केंद्रीय रही।
- सीमा पार से आने वाले आतंकी नेटवर्क को ध्वस्त करने में डोभाल की छवि “निर्णायक रणनीतिकार” की रही है।
4. मोदी के ‘संकटमोचक’
मोदी सरकार के कई कठिन मौकों पर डोभाल ही समाधान लेकर आए। चाहे कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना हो या भारत-चीन सीमा पर तनाव—हर बार पीएम मोदी ने डोभाल पर भरोसा किया।
5. आयु से परे सक्रियता
80 वर्ष की आयु में भी उनकी ऊर्जा और सक्रियता किसी युवा अधिकारी से कम नहीं लगती। विदेश यात्राओं, बैक-टू-बैक बैठकों और लगातार रणनीति बनाने में उनकी सक्रिय मौजूदगी मोदी के लिए भरोसे का बड़ा कारण है।
ट्रंप से लेकर पुतिन तक: डोभाल का कूटनीतिक संतुलन
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत पर लगातार बयानबाज़ी कर रहे थे। इस दौरान डोभाल का पुतिन से मुलाकात करना सिर्फ रूस से रिश्तों को मजबूत करना नहीं था, बल्कि अमेरिका और चीन को भी यह संदेश देना था कि भारत के पास वैश्विक स्तर पर कई विकल्प हैं।
यही नहीं, चीन के साथ रिश्तों को संभालने में भी डोभाल ने अहम भूमिका निभाई। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भी वे चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से सीधे संवाद में रहे और तनाव को कम करने की कोशिश की।
क्यों कहते हैं उन्हें “मोदी का चाणक्य”?
- क्योंकि पीएम मोदी किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट में सबसे पहले डोभाल से राय लेते हैं।
- विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से भी अधिक महत्व कभी-कभी डोभाल को मिलता है।
- उन्हें सुरक्षा और कूटनीति दोनों में समान अधिकार है।
- मोदी की “न्यू इंडिया” की सुरक्षा और विदेश नीति का सबसे बड़ा आर्किटेक्ट डोभाल ही हैं।
भविष्य की चुनौतियां और डोभाल की भूमिका
आने वाले समय में भारत के सामने कई बड़ी चुनौतियां होंगी—
- भारत-चीन सीमा पर बढ़ता तनाव
- पाकिस्तान के साथ रिश्तों में खटास
- रूस-यूक्रेन युद्ध का असर
- अमेरिका की बदलती नीतियां
- मध्य-पूर्व में अस्थिरता
इन सभी जटिल मुद्दों को संभालने में डोभाल की रणनीति और अनुभव अहम होंगे।
80 वर्षीय अजीत डोभाल केवल एक सुरक्षा सलाहकार नहीं, बल्कि मोदी सरकार के भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार हैं। पीएम मोदी उन्हें इसलिए सबसे अधिक महत्व देते हैं क्योंकि वे न सिर्फ सुरक्षा और विदेश नीति की बारीकियों को समझते हैं, बल्कि संकट की घड़ी में समाधान भी निकाल लाते हैं।
आज भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे मजबूत कड़ी अगर कोई है, तो वह अजीत डोभाल हैं। यही कारण है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी वे भारतीय राजनीति और कूटनीति के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी बने हुए हैं।