ईमान को ईमान से मिलाओ
इरफ़ान को इरफ़ान से मिलाओ
इंसान को इंसान से मिलाओ
गीता को क़ुरान से मिलाओ
दैर-ओ-हरम में हो ना जंग
होली खेलो हमारे संग
क्या नज़ीर ख़य्यामी की लिखी इन पक्तियों में इतनी मोहब्बत है? क्या सोशल मीडिया पर मौजूद मुसलामानों के होली खेलने की तस्वीरें एक अटूट भारत की चमक और बढ़ाती हैं? क्या हमारे देश में सभी एक दुसरे का सम्मान करते हैं? क्या बहुत सारे हिन्दू मंदिर जाते हैं और साथ ही दरगाह पर फूल भी चढाते हैं? क्या मुस्लिम एक तरफ नमाज पढ़ते हैं तो वहीँ हिन्दुओं के त्योहारों के जश्न में शामिल भी होते हैं? क्या मैंने उन मुसलमानों को देखा हैं जिन्होंने हिन्दू धर्म की कथा भी सुना और प्रसाद भी लिया, जिन्होंने कावड़ियों का स्वागत भी किया और हर हर महादेव के उद्घोष के साथ भंडारा भी करवाया? क्या मैंने कभी उन मुसलमानों को देखा हैं जिन्होंने किसी हिन्दू के लिए दुआ पढ़ी हो? अगर आपने देखा है तो फिर इतनी बयानबाजियां क्यों? अब इतनी पाबंदियाँ क्यों?
क्या वाकई होली पर रंग लगाना इस्लाम में हराम है? तो क्या इसका यही समाधान है? 6 मार्च को संभल में पीस कमेटी की बैठक में सीओ अनुज चौधरी ने कहा था- शुक्रवार तो साल में 52 बार आता है, होली एक बार आती है। अगर रंग से परहेज है तो नमाज घर में ही पढ़ लेना।
हालांकि बाद में अनुज चौधरी ने कहा- मेरा स्पष्ट संदेश है, जिसमें कैपेसिटी हो रंग खेलने की, जिसका बड़ा मन हो वह बाहर निकले। नहीं तो अनावश्यक कोई भी आदमी बाहर न निकले। अब सीओ साहब को शांति बनाये रखने का जो तरीका समझ में आया हो लेकिन मंत्री जी ने जो तरीका बताया है उसपर शोध की सख्त आवश्यकता महसूस होती है…
योगी सरकार में राज्यमंत्री ठाकुर रघुराज सिंह ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि- अगर सफेद टोपी वाले को रंग से डर लगता है तो होली के दिन घर में ही नमाज पढ़ें। जैसे होली पर मस्जिद को तिरपाल से ढक दिया जाता है। महिलाएं हिजाब पहनती हैं, वैसे ही सफेद टोपी वाले तिरपाल का हिजाब पहनकर घर से नमाज पढ़ने के लिए निकलें। इससे उनकी टोपी और सफेद कपड़े रंग और गुलाल से बचे रहेंगे।
भगवान कृष्ण के भक्त इब्राहिम रसख़ान आज यदि होते तो वो भी अपना माथा पकड़ लेते, 1548-1603 के दौरान इब्राहिम रसख़ान का जिक्र होता है, उन्हें कृष्ण भक्त कहा जाता है। वो लिखते हैं :
आज होरी रे मोहन होरी,
काल हमारे आंगन गारी दई आयो, सो कोरी,
अब के दूर बैठे मैया धिंग, निकासो कुंज बिहारी
दिल्ली सल्तनत और मुग़लिया दौर के मुस्लिम सूफ़ी संत और कवियों ने होली पर कई बेहतरीन रचनाए गढ़ी हैं, उन्ही में से एक बाबा बुल्लेशाह लिखते हैं :
होरी खेलूंगी, कह बिसमिल्लाह,
नाम नबी की रतन चढ़ी, बूंद पड़ी अल्लाह अल्लाह.
मुग़ल होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पालशी कहते थे और बड़ी ही धूमधाम से उसे मनाते थे। अगर आप गूगल पर मुग़ल और होली गूगल करेंगे तो आपको उस वक़्त के राजा और रानियों की तमाम पेंटिंग देखने को मिलेंगी, नवाब और बेगमों की होली मनाती तस्वीरें भी मिल जाएंगी।
कोई समाज कभी भी सम्पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं रहा, मोहब्बत करने वाले पहले भी थे और आज भी हैं, नफरत करने वाले पहले भी थे और आज भी हैं, इंसान को धर्म और जाति में बांटकर सत्ता पाने को बेताब कल भी थे और आज भी हैं। लेकिन यदि हमें अपने समाज को स्वस्थ बनाना है तो सदेव प्रचार इतिहास के पन्नो के काले अध्याय का नहीं होना चाहिए, बल्कि उस सकारत्मक तस्वीरों का होना चाहिए जिससे हमारा समाज स्वस्थ हो।
लेकिन आज उत्तर प्रदेश के बांसडीह की विधायक केतकी सिंह कहती हैं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग करती हूं कि मुसलमानों के लिए मेडिकल कॉलेज में अलग विंग, अलग बिल्डिंग बना दिया जाए। जिससे हिंदू सुरक्षित रह सकें।
अब ये गुमान था या सम्मान, भैया हम तो कंफ्यूज हैं लेकिन चलिए एक तरफ़ा ही सही किसी के लिए सम्मान तो है ही। जनप्रतिनिधि का मतलब होता है जनता का प्रतिनिधि, जो जनता की आवाज को सरकार तक पहुंचाए और समस्याओं का समाधान लाए। लेकिन इसके लिए समानता की आवश्यकता है।
जहाँ एक तरफ हमारे वीर योद्धाओं और क्रांतिकारियों ने हमारी धरोहर संभाला तो वहीँ मुग़ल भी भारतीय संस्कृति और त्योहारों के कायल थे, अब अकबर को ही ले लीजिये, माँ वैष्णो देवी, ज्वाला देवी से लेकर स्वर्ण मंदिर तक अकबर का जिक्र मिल जायेगा, वहीँ अवध के नवाबों ने त्योहारों को अलग मुक़ाम तक पहुंचाया। (1723-1810) के दौरान मीर तक़ी मीर ने लिखा है कि-
होली खेला आसिफ़-उद-दौला वज़ीर,
रंग सोहबत से अजब हैं ख़ुर्द-ओ-पीर ,
मुसलमानों को लेकर एक तरफ जहाँ कुछ नेताओं के अटपटे बयान आयें तो वहीँ सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर का अलाग तर्क है, वो कहते हैं कि जब कोई दुर्घटना होती है तो लोग सिर्फ ब्लड खोजते हैं, कोई ये नही देखता कि हिन्दू,मुस्लिम,सिख या ईसाई का ब्लड है।
तारीख़-ए-हिंदुस्तानी में मुंशी ज़काउल्लाह ने कहा भी है, ”कौन कहता है कि होली हिंदुओं का त्योहार है?” यानि ये त्यौहार हर धर्म का है, हर हिन्दुस्तानी का है। प्रसिद्ध शायर नज़ीर बनारसी लिखते हैं कि
कहीं पड़े ना मोहब्बत की मार होली में
अदा से प्रेम करो दिल से प्यार होली में
गले में डाल दो बाहों का हार होली में
उतारो एक बरस का ख़ुमार होली में
जय हिन्द…