“PK और ओवैसी ने बदल दिया समीकरण… क्या खतरे में तेजस्वी का किला?”

बिहार की राजनीति एक बार फिर नए समीकरणों से गुजर रही है। मुस्लिम बहुल इलाकों की 11 विधानसभा सीटों पर महागठबंधन को इस बार दो मोर्चों से कड़ी टक्कर मिल रही है। जन सुराज (Jan Suraj) के प्रशांत किशोर और AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी मैदान में उतर चुके हैं और दोनों ही दलों ने अपने मुस्लिम प्रत्याशी उतारकर समीकरण बदल दिए हैं। ऐसे में इन सीटों पर मुकाबला अब केवल सत्ता दलों के बीच नहीं, बल्कि मुसलमान बनाम मुसलमान हो गया है।

2020 की तुलना में मुश्किल हुई राह:
पिछले विधानसभा चुनाव (Assembly Election 2020) में इन 11 मुस्लिम बहुल सीटों पर महागठबंधन ने 6 सीटें जीतकर अपनी पकड़ मजबूत की थी, जबकि NDA इन सीटों पर एक भी जीत हासिल नहीं कर सका था। AIMIM ने उस समय 5 सीटें अपने नाम की थीं। लेकिन इस बार जन सुराज और AIMIM दोनों की सक्रियता से महागठबंधन की राह कठिन होती दिख रही है। स्थानीय स्तर पर मुस्लिम वोटों का बिखराव सीधा असर डाल सकता है।

जन सुराज और AIMIM का डेंट:
जानकारों के अनुसार, प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की जन सुराज पार्टी ने 11 में से 10 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) ने भी सभी सीटों पर मुसलमान प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। इस रणनीति से वे मुस्लिम मतदाताओं को सीधे तौर पर टारगेट कर रहे हैं। इससे महागठबंधन के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगने की संभावना बन गई है।

NDA की रणनीति:
वहीं दूसरी ओर NDA ने भी इस बार मुस्लिम बहुल इलाकों को नजरअंदाज नहीं किया है। गठबंधन की तरफ से 4 सीटों पर मुस्लिम चेहरे उतारे गए हैं। इससे स्पष्ट है कि NDA भी वोट बैंक की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। अगर जन सुराज और AIMIM मुस्लिम वोटों को बांटने में सफल हुए, तो इसका अप्रत्यक्ष लाभ NDA को मिल सकता है।

कई सीटों पर चारों दलों के मुस्लिम प्रत्याशी:
इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि 3 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां महागठबंधन, जन सुराज, NDA और AIMIM—चारों दलों ने मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। ऐसे में मुकाबला पूरी तरह से मुस्लिम चेहरों के बीच सिमट गया है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस स्थिति में वोटों का ध्रुवीकरण महागठबंधन के खिलाफ जा सकता है।

मुस्लिम वोट बैंक की दिशा तय करेगी नतीजे:
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार मुस्लिम मतदाता जिस दिशा में एकजुट होंगे, वही उम्मीदवार या दल इन सीटों पर जीत दर्ज करेगा। AIMIM और जन सुराज के प्रवेश से यह तय है कि महागठबंधन को पिछले चुनाव जैसी सफलता नहीं मिलेगी। NDA के लिए यह मौका है कि वह विभाजित वोटों का लाभ उठाकर सीटें निकाल सके।

निष्कर्ष:
बिहार के मुस्लिम बहुल इलाकों में इस बार का चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि प्रभाव और रणनीति की परीक्षा भी है। महागठबंधन के लिए यह चुनौतीपूर्ण समय है, क्योंकि प्रशांत किशोर और असदुद्दीन ओवैसी ने इस क्षेत्र में नई राजनीतिक संभावनाएं खड़ी कर दी हैं।


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डिस्क्लेमर: यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है।

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