माघ मेले के पहले स्नान पर्व पौष पूर्णिमा के अवसर पर तीर्थराज प्रयागराज (Prayagraj) में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की पावन त्रिवेणी पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ पड़ी। कड़ाके की ठंड और शीतलहर के बावजूद आस्था का उत्साह कम नहीं दिखा। ब्रह्म मुहूर्त से ही श्रद्धालु संगम तट पर पहुंचकर स्नान, दान और पुण्य कर्म में लीन नजर आए। पौष पूर्णिमा के दिन संगम में स्नान का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है, जिसके चलते देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां पहुंचे।

ब्रह्म मुहूर्त से शुरू हुआ स्नान का क्रम:
पौष पूर्णिमा के पावन पर्व पर ब्रह्म मुहूर्त से ही संगम की त्रिवेणी में स्नान का क्रम शुरू हो गया। सुबह की ठंड और कोहरे के बीच श्रद्धालु गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम में डुबकी लगाते नजर आए। स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने दान-पुण्य कर अपने और अपने परिवार के कल्याण की कामना की। पूरे संगम क्षेत्र में हर-हर गंगे और जय संगम के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना रहा।
पौष पूर्णिमा का धार्मिक महत्व:
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पौष पूर्णिमा को पितरों की पूर्णिमा माना जाता है। इस दिन संगम में स्नान और दान करने से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसे कल्याण पर्व के रूप में भी जाना जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि पौष पूर्णिमा पर किया गया स्नान और दान जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है। इसी आस्था के चलते हर वर्ष इस दिन संगम तट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
कल्पवास की शुरुआत का विशेष दिन:
पौष पूर्णिमा के दिन से ही संगम की रेती पर लगने वाले माघ मेले में कल्पवास की शुरुआत होती है। कल्पवासी इस दिन से पितरों के मोक्ष और अपनी कामनाओं की पूर्ति का संकल्प लेकर संगम तट पर निवास शुरू करते हैं। माघ महीने तक चलने वाले इस कल्पवास में श्रद्धालु संयम, साधना और भक्ति का जीवन अपनाते हैं। पौष पूर्णिमा कल्पवास का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
ठंड के बावजूद आस्था रही मजबूत:
कड़ाके की ठंड और सुबह के समय ठिठुरन के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। स्नान के लिए संगम तट पर पहुंचे लोगों ने बताया कि आस्था के आगे मौसम की कठिनाइयां गौण हो जाती हैं। श्रद्धालु स्नान के बाद संगम तट पर बैठकर पूजा-पाठ, जप-तप और दान करते नजर आए। पूरे मेला क्षेत्र में आध्यात्मिक ऊर्जा का विशेष अनुभव देखने को मिला।
माघ मेले में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़:
पौष पूर्णिमा के साथ ही माघ मेले की औपचारिक शुरुआत हो गई है। संगम की रेती पर तंबुओं और कल्पवासियों की मौजूदगी से मेला क्षेत्र जीवंत हो उठा है। श्रद्धालु यहां पितरों की शांति, मोक्ष और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना लेकर पहुंचे हैं। माघ मेले के दौरान आने वाले अन्य स्नान पर्वों को लेकर भी श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है।
आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम:
पौष पूर्णिमा पर संगम में स्नान केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और संस्कृति का प्रतीक भी है। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को निभाने के लिए श्रद्धालु हर कठिनाई के बावजूद तीर्थराज प्रयागराज पहुंचते हैं। माघ मेले का यह पहला स्नान पर्व श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा और विश्वास का स्रोत बनकर सामने आया है।
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