रिपोर्टर: अनुज कुमार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर (Mirzapur) जिले में मदरसों की मंजूरी और सरकारी धन के उपयोग को लेकर एक बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है। विशेष जांच दल एसआईटी (SIT) की विस्तृत जांच में सामने आया है कि कुल 143 मदरसों के निरीक्षण में 89 मदरसों की मंजूरी प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं की गईं। जांच में यह भी स्पष्ट हुआ कि मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत शिक्षकों को बिना भौतिक और दस्तावेजी सत्यापन के अवैध रूप से मानदेय का भुगतान किया गया, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा।
एसआईटी की रिपोर्ट के अनुसार यह मामला केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें अधिकारियों, कर्मचारियों और मदरसा प्रबंधकों की मिलीभगत से योजनाबद्ध तरीके से नियमों की अनदेखी की गई। जांच में यह तथ्य सामने आया है कि स्वीकृति से पहले आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और बिना समुचित जांच के अस्थायी मंजूरी देकर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया।
एसआईटी जांच में सामने आई अनियमितताएं:
एसआईटी ने मिर्जापुर जिले के मदरसों की फाइलों, रिकॉर्ड और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की गहन समीक्षा की। जांच में पाया गया कि कई मदरसों को अस्थायी मंजूरी देकर उनके लिए शिक्षकों के वेतन का बजट मांग लिया गया। कुछ मामलों में ऐसे मदरसों को भी भुगतान किया गया, जिनके लिए बजट स्वीकृत ही नहीं था। यह प्रक्रिया उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम 2004 और शासन के स्पष्ट आदेशों का उल्लंघन मानी गई।
जांच रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि मदरसा आधुनिकीकरण योजना का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाना था, लेकिन इसका इस्तेमाल निजी लाभ और भ्रष्टाचार के लिए किया गया। बिना किसी वास्तविक निरीक्षण के फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भुगतान किया गया, जिससे पारदर्शिता पूरी तरह खत्म हो गई।
अधिकारियों और प्रबंधकों की भूमिका:
रिपोर्ट में कई अधिकारियों और कर्मचारियों की संलिप्तता सामने आई है। इनमें नीरज कुमार अग्रवाल (वर्तमान जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी, सिद्धार्थनगर), विष्णु कुमार मिश्रा (वर्तमान जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी, सोनभद्र), विजय प्रताप यादव (वर्तमान उप निदेशक, आजमगढ़), शिव शंकर मालवीय (सेवानिवृत्त क्लर्क), राजेश गिरि (कंप्यूटर ऑपरेटर) और 42 मदरसा प्रबंधकों के नाम शामिल हैं। एसआईटी ने इन सभी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 409 और 120-बी के तहत एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की है।
जांच में यह स्पष्ट हुआ कि अधिकारियों और कर्मचारियों ने मदरसा प्रबंधकों के साथ मिलकर सरकारी आदेशों को दरकिनार किया और नियमों की अनदेखी करते हुए भुगतान की प्रक्रिया पूरी की। इससे यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित भ्रष्टाचार का रूप लेता नजर आया।
करोड़ों रुपये के गबन के सबूत:
एसआईटी की रिपोर्ट में करीब 10 करोड़ रुपये के सरकारी धन के गबन के प्रमाण मिलने की बात कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार इस धनराशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के बजाय अवैध भुगतान और फर्जी प्रक्रियाओं में किया गया। जांच में यह भी सामने आया कि 2017 में विनोद कुमार जायसवाल (वर्तमान में गोरखपुर के उप निदेशक) पर बिना सत्यापन के डिजिटल हस्ताक्षरों के माध्यम से मदरसों को लॉक करने और लगभग 1 करोड़ 94 लाख रुपये का भुगतान करने का आरोप है। हालांकि उनके खिलाफ विभागीय जांच पहले से चल रही है, लेकिन इस मामले में उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश नहीं की गई है।
जांच की पृष्ठभूमि और समयरेखा:
इस मामले की जांच 26 जून 2020 को अल्पसंख्यक कल्याण निदेशक की सिफारिश पर एसआईटी को सौंपी गई थी। इसके बाद 2 नवंबर 2020 को औपचारिक रूप से जांच शुरू की गई। जांच के दौरान दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ-साथ मौखिक बयान भी दर्ज किए गए। लंबे समय तक चली इस प्रक्रिया के बाद एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं की पुष्टि की है।
आगे की संभावित कार्रवाई:
एसआईटी रिपोर्ट सामने आने के बाद राज्य स्तर पर सख्त कानूनी और विभागीय कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है। माना जा रहा है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच एजेंसियां आगे की कार्रवाई करेंगी, जिससे मदरसा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। इस मामले को शिक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।
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