मौलाना महमूद मदनी इन दिनों अपने बयानों को लेकर लगातार चर्चा में बने हुए हैं। जमीयत उलमा-ए-हिंद (Jamiat Ulama-e-Hind) के प्रमुख मदनी ने हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में जिहाद, देश की राजनीति, कानूनी एजेंसियों की कार्रवाई और पाठ्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखी। मदनी के ताजा बयान कई राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस का विषय बने हुए हैं।
देश की राजनीति और जिहाद पर टिप्पणी:
जमीअत प्रमुख मदनी ने जिहाद, देश की सियासत और स्कूलों के पाठ्यक्रम जैसे मुद्दों पर अपनी राय सामने रखते हुए कहा कि जिहाद के वास्तविक अर्थों को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जो लोग जिहाद का विरोध कर रहे हैं, वे देश और समाज के हित में नहीं हैं। मदनी के अनुसार जिहाद को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि विद्यार्थी इसका सही अर्थ समझ सकें। साथ ही उन्होंने कांग्रेस (Congress) के जनाधार पर भी सवाल उठाए और इस बात पर जोर दिया कि राजनीतिक दलों को देश की वास्तविकताओं को समझकर आगे बढ़ना चाहिए।
वंदे मातरम पर प्रतिक्रिया:
मदनी ने भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम (Vande Mataram) को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि इसे बोलने को लेकर जबरदस्ती किए जाने की प्रवृत्ति चिंता का विषय है। उनके अनुसार, देश की विविधता और धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए किसी भी व्यक्ति पर दबाव नहीं डाला जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मजबूरी में कुछ बोलने का दबाव डालना “आइडिया ऑफ इंडिया” नहीं है।
जिहाद शब्द के दुरुपयोग पर चिंता:
एक अन्य इंटरव्यू में मदनी ने जिहाद शब्द के दुरुपयोग को लेकर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि लंबे समय से इस शब्द को गालियों से जोड़कर पेश किया गया है। मदनी के अनुसार, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना भी जिहाद है। उन्होंने कहा कि यह धारणा गलत है कि सभी मुसलमान ‘जिहादी’ या ‘फसादी’ हैं। मदनी का कहना था कि सरकारी स्तर पर भी मुसलमानों को निशाना बनाए जाने की धारणा बढ़ती जा रही है और इसी कारण जिहाद के असली अर्थों को बताना उनकी जिम्मेदारी है।
पाकिस्तान और परवेज मुशर्रफ से जुड़ी घटना:
मदनी ने इंटरव्यू में पाकिस्तान (Pakistan) के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ (Pervez Musharraf) से जुड़ा एक प्रसंग भी साझा किया। उन्होंने कहा कि पहले समाज में 90 प्रतिशत लोग चुप रहते थे, लेकिन यह संख्या अब घटकर 60 प्रतिशत हो गई है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से जुड़े एक सवाल पर उन्होंने कहा कि उनकी बातों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह सिर्फ एक व्यक्ति के तौर पर नहीं, बल्कि अपने समुदाय की भावनाओं को सामने लाने वाले संगठन का हिस्सा हैं।
देश के हालात और असुरक्षा की भावना:
मदनी ने देश के बदलते हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि संविधान की अवधारणा बहुसंख्यकवाद के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि आज वातावरण ऐसा बना दिया गया है कि मुसलमान खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। मदनी के अनुसार, किसी भी समुदाय की भावनाओं को सम्मानपूर्वक सुना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके बयानों से असहमति हो सकती है, लेकिन उन्हें अपनी बात कहने से रोकना उचित नहीं है। मौजूदा हालात को देखते हुए उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि समाज में असंतोष की भावना को नजरअंदाज करना ठीक नहीं है।
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