शियाओं का नंगे पांव मातम, ट्रम्प-सऊदी प्रिंस की तस्वीरें रौंदी; लखनऊ में 21वें रमजान पर जुलूस में ताबूत चूमने की मची होड़

लखनऊ (Lucknow) में 21वें रमजान के मौके पर शिया समुदाय की ओर से पारंपरिक मातमी जुलूस निकाला गया। इस दौरान हजारों अकीदतमंद नम आंखों के साथ हजरत अली के ताबूत की जियारत करते नजर आए। जुलूस में शामिल लोग ‘या अली मौला’ और ‘हैदर मौला’ के नारे लगाते हुए आगे बढ़ते रहे। धार्मिक आस्था और शोक की भावना से भरे इस जुलूस में बड़ी संख्या में पुरुष, महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे शामिल हुए। सभी श्रद्धालु काले वस्त्र पहनकर और नंगे पांव चलकर हजरत अली की शहादत को याद करते दिखे।

नजफ इमामबाड़ा से शुरू हुआ जुलूस:
यह मातमी जुलूस लखनऊ (Lucknow) के नजफ इमामबाड़ा (Najaf Imambara) सआदतगंज (Saadatganj) से शुरू हुआ। सुबह करीब 5 बजे आरंभ हुआ यह जुलूस शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरता हुआ कर्बला तालकटोरा (Karbala Talkatora) पर जाकर समाप्त हुआ। करीब छह किलोमीटर लंबे इस जुलूस में लगभग 50 हजार अकीदतमंदों के शामिल होने की जानकारी सामने आई। पूरे रास्ते धार्मिक नारों और मातमी माहौल के बीच लोग हजरत अली के ताबूत की जियारत करने के लिए उमड़ते रहे।

ताबूत की जियारत के लिए उमड़ी भीड़:
जुलूस के दौरान श्रद्धालुओं में ताबूत को छूने और चूमने की होड़ दिखाई दी। काले कपड़े पहने लोग गम और श्रद्धा के साथ जुलूस में शामिल हुए। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की बड़ी संख्या भी इस मातमी जुलूस में मौजूद रही। जुलूस के दौरान धार्मिक अनुशासन और पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया गया।

हैदरगंज में निभाई गई पारंपरिक रस्म:
जुलूस जब हैदरगंज (Haiderganj) क्षेत्र से होकर गुजरा तो वहां परंपरा के अनुसार कुछ समय के लिए ताबूत को एक कुएं के पास रोका गया। इस दौरान ताबूत पर काली चादर चढ़ाई गई और विशेष दुआएं की गईं। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और हर वर्ष 21वें रमजान के जुलूस में इसे निभाया जाता है।

जुलूस के दौरान विरोध के प्रतीक भी दिखे:
जुलूस के मार्ग में कुछ स्थानों पर सऊदी अरब (Saudi Arabia) के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन सलमान (Mohammed bin Salman) और अमेरिका (United States) के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) की तस्वीरें सड़क पर चिपकाई गई थीं। जुलूस में शामिल कुछ लोग इन तस्वीरों पर पैर रखते हुए आगे बढ़ते नजर आए। इसे कुछ लोगों ने अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के विरोध के प्रतीक के रूप में देखा।

हजरत अली की शहादत की याद में जुलूस:
शिया समुदाय की मान्यता के अनुसार 19वीं रमजान को हजरत अली नमाज अदा करने के लिए मस्जिद पहुंचे थे, तभी उन पर तलवार से हमला किया गया था। इस हमले के बाद 21वें रमजान को उनकी शहादत हुई थी। उसी घटना की याद में हर वर्ष 21वें रमजान को मातमी जुलूस निकाला जाता है और अकीदतमंद उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

सुबह शुरू हुआ यह जुलूस लगभग 11:30 बजे कर्बला तालकटोरा (Karbala Talkatora) पहुंचकर संपन्न हुआ। पूरे कार्यक्रम के दौरान धार्मिक अनुशासन और परंपराओं का पालन करते हुए श्रद्धालुओं ने हजरत अली की शहादत को याद किया।

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