दशहरा मेला में बदलते रंग: रामायण संगोष्ठी खाली, पंजाबी सम्मेलन में उमड़ी भीड़


लखीमपुर (Lakhimpur) में इस वर्ष का दशहरा मेला (Dussehra Mela) 2025 धार्मिक भावना और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ 4 अक्टूबर को शनिवार के दिन आरंभ हुआ। इस अवसर पर परंपरागत रूप से रामायण संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जो वर्षों से इस मेले की आध्यात्मिक पहचान रही है। संगोष्ठी में विद्वानों द्वारा भगवान श्रीराम के आदर्शों और जीवन संदेशों पर चर्चा की गई। लेकिन इस बार का दृश्य पहले से बिल्कुल अलग था — सभागार में सजी कुर्सियाँ खाली रहीं, मंच पर वक्ता मौजूद थे, संवाद था, परंतु श्रोता नदारद थे। आयोजकों की मेहनत और धर्माचार्यों का ज्ञान जैसे खाली हॉल की दीवारों से टकराकर लौट आया।


धार्मिक कार्यक्रम में सन्नाटा, मनोरंजन मंच पर भीड़:
रामायण संगोष्ठी के विपरीत 8 अक्टूबर, बुधवार को मेला स्थल पर आयोजित पंजाबी संगीत सम्मेलन (Punjabi Music Conference) ने पूरे माहौल को बदल दिया। मंच के चारों ओर पैर रखने की जगह तक नहीं बची। देर रात तक DJ की धुनों पर झूमते युवाओं की भीड़, मोबाइल की फ्लैशलाइट में नाचते झुंड, और सोशल मीडिया (Social Media) पर वायरल होते वीडियो यह दिखाने के लिए पर्याप्त थे कि समाज की रुचियाँ अब किस दिशा में जा रही हैं। जहाँ एक ओर आध्यात्मिक संवाद खाली हॉल में गूंज रहा था, वहीं दूसरी ओर मनोरंजन की धुनों पर झूमते लोगों का उत्साह चरम पर था।


धार्मिक आयोजनों की उपेक्षा, बढ़ती मनोरंजन की ललक:
यह दृश्य केवल इस वर्ष का नहीं, बल्कि बीते कुछ वर्षों से बनती जा रही एक प्रवृत्ति को दर्शाता है। अब रामायण पाठ, भागवत कथा या देवी जागरण जैसे धार्मिक कार्यक्रमों में लोगों की उपस्थिति घटती जा रही है, जबकि डांस शो, गायन प्रतियोगिता और फिल्मी गीतों पर आधारित आयोजनों में भारी भीड़ उमड़ती है। यह परिवर्तन केवल संस्कृति का बदलाव नहीं, बल्कि समाज की प्राथमिकताओं का आईना है। धर्म और संस्कृति से दूरी और मनोरंजन की अंधी दौड़, आज के युग की नई पहचान बन चुकी है।


कहाँ जा रहा है समाज?:
जब समाज धार्मिक आयोजनों को ‘पुराना’ या ‘बोरिंग’ कहकर नज़रअंदाज़ करने लगता है, तब यह केवल परंपरा की नहीं, बल्कि विचारों की भी हानि है। यदि आज हम भगवान राम के आदर्शों, मर्यादा और आचरण को भूलने लगें और उनकी जगह केवल आधुनिक मनोरंजन को महत्व दें, तो आने वाली पीढ़ियाँ किन मूल्यों पर खड़ी होंगी? यह सवाल अब विचार का नहीं, चिंता का विषय बन चुका है। हमें यह तय करना होगा कि क्या हम अपनी संस्कृति को सिर्फ इतिहास की किताबों में देखना चाहते हैं या उसे जीवन का हिस्सा बनाए रखना चाहते हैं।


समाज के लिए आत्ममंथन का समय:
दशहरा मेला सिर्फ मनोरंजन का नहीं, बल्कि संस्कृति और श्रद्धा का भी प्रतीक रहा है। लेकिन अगर इसमें धार्मिक मूल्यों की जगह केवल धुनों और रोशनी ने ले ली है, तो यह समाज के आत्ममंथन का समय है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि भीड़ कहाँ है और क्यों है। मेला का उद्देश्य केवल आनंद नहीं, बल्कि अपनी परंपरा और आदर्शों से जुड़ने का माध्यम भी है। अगर यह जुड़ाव टूट गया, तो भविष्य की पीढ़ियाँ केवल मनोरंजन की नहीं, बल्कि मूल्यहीनता की विरासत पाएंगी।

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डिस्क्लेमर: यह खबर स्थानीय संवादाता द्वारा दी गई सूचना पर आधारित है, जिसकी समस्त जिम्मेदारी स्थानीय संवादाता की है।

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