मैं लखनऊ में ईरान से जुड़े मुद्दे पर हो रहे प्रदर्शनों की निंदा करता हूँ: डॉ. राजेश्वर सिंह

लखनऊ (Lucknow) में अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को लेकर विभिन्न स्थानों पर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण तरीके से अभिव्यक्ति का अधिकार है। इसी क्रम में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर हो रही चर्चाओं और प्रदर्शनों के बीच मानवाधिकारों को लेकर दृष्टिकोण पर भी सवाल उठने लगे हैं। इस संदर्भ में डॉ. राजेश्वर सिंह (Dr. Rajeshwar Singh) ने कहा कि मानवाधिकारों के प्रश्न पर चयनात्मक नहीं, बल्कि सिद्धांत आधारित सोच अपनाना समय की आवश्यकता है।

A man speaking passionately at a microphone while gesturing, wearing traditional attire with an orange scarf and bracelets.

चयनात्मक नैतिकता पर उठाए सवाल:
डॉ. राजेश्वर सिंह (Dr. Rajeshwar Singh) ने कहा कि जब ईरान (Iran) में बाल विवाह की आयु को 9 वर्ष तक किए जाने के प्रस्ताव को लेकर बहस हुई और बड़ी संख्या में युवा छात्राओं ने विरोध प्रदर्शन किए, तब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार की आवाजें उतनी मुखर क्यों नहीं रहीं। उन्होंने कहा कि कठोर कार्रवाई के दौरान अनेक युवाओं की जान जाने की खबरें सामने आईं, लेकिन उस समय व्यापक और संगठित प्रतिक्रिया अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं दी।

अफगानिस्तान के मुद्दे पर भी प्रश्न:
इसी तरह अफगानिस्तान (Afghanistan) में बेटियों की शिक्षा को सीमित किए जाने, विश्वविद्यालयों के द्वार लड़कियों के लिए बंद किए जाने और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी कम किए जाने की घटनाओं का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि इन विषयों पर भी समान रूप से मुखर और संगठित विरोध देखने को नहीं मिला। उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि यदि मानवाधिकार सार्वभौमिक हैं, तो हर स्थान पर समान संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई जाती।

लखनऊ में प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया:
डॉ. राजेश्वर सिंह (Dr. Rajeshwar Singh) ने लखनऊ (Lucknow) में ईरान (Iran) से संबंधित मुद्दे पर हो रहे प्रदर्शनों की निंदा करते हुए कहा कि लोकतंत्र में बोलना अधिकार है, किंतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। उन्होंने कहा कि प्रश्न यह नहीं है कि कोई अपनी बात क्यों रख रहा है, बल्कि यह है कि क्या हम हर अन्याय के प्रति समान रूप से संवेदनशील हैं या परिस्थितियों और राजनीतिक सुविधा के आधार पर प्रतिक्रिया देते हैं।

मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता पर जोर:
डॉ. सिंह ने कहा कि मानवाधिकार किसी भूगोल, सीमा या राजनीतिक संदर्भ तक सीमित नहीं होते। नारी गरिमा, शिक्षा का अधिकार और युवाओं की सुरक्षा जैसे विषय वैश्विक महत्व के हैं। यदि न्याय, समानता और गरिमा की बात की जाती है, तो यह सिद्धांत हर देश और हर परिस्थिति में समान रूप से लागू होने चाहिए।

सिद्धांत आधारित संवेदनशीलता की अपील:
उन्होंने कहा कि चयनात्मक आक्रोश से विश्वसनीयता कमजोर होती है और इससे मानवाधिकारों के मुद्दे पर गंभीरता कम हो सकती है। सिद्धांत आधारित, निष्पक्ष और सार्वभौमिक संवेदनशीलता ही सच्ची नैतिकता की पहचान है। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक है कि हर अन्याय पर समान रूप से आवाज उठाई जाए और मानवाधिकारों के प्रश्न पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाए।

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A man speaking into a microphone with one hand raised, wearing a white shirt and an orange scarf.

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