लखनऊ। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य तंत्र में लापरवाही और भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एक ही पंजीयन संख्या (98616) पर दो अलग-अलग डॉक्टरों के नाम दर्ज किए गए हैं और इसी पंजीयन पर एक निजी अस्पताल को पाँच साल के लिए संचालन की अनुमति तक दे दी गई। यह गंभीर मामला स्वास्थ्य विभाग के भीतर गहरी मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
गौतमबुद्धनगर के जेवर टप्पल रोड पर स्थित निजी अस्पताल ने सीएमओ कार्यालय को जो दस्तावेज दिए, उनमें डॉ. नितेश कुमार का पंजीयन संख्या 98616 लिखा गया था। लेकिन उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल के रिकॉर्ड में इस संख्या पर डॉ. यूसुफ पुत्र मोहरसन का नाम दर्ज है। आश्चर्यजनक रूप से, सीएमओ कार्यालय ने बिना सत्यापन किए उसी पंजीयन पर अस्पताल को पाँच साल के लिए रजिस्ट्रेशन दे दिया।
यह मामला सूचना के अधिकार के तहत उजागर हुआ। 24 जुलाई 2025 को प्राप्त जानकारी के अनुसार, मेडिकल काउंसिल ने स्पष्ट कर दिया कि पंजीयन संख्या 98616 पर डॉ. यूसुफ ही पंजीकृत हैं। यानी सीएमओ कार्यालय को दिए गए दस्तावेज जाली थे या फिर गहन जांच के बिना मंजूरी दे दी गई, जिससे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठते हैं।
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. रत्नलाल सिंह सुमन ने कहा है कि बिना मेडिकल काउंसिल में पंजीयन कराए कोई डॉक्टर मरीज नहीं देख सकता। अस्पतालों के लिए भी वैध दस्तावेजों के आधार पर ही पंजीकरण होता है। यदि फर्जी दस्तावेज लगाए गए हैं तो उसकी जांच कराई जाएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि एक ही पंजीयन संख्या पर दो डॉक्टरों का नाम होना न केवल गंभीर त्रुटि है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा से सीधा खिलवाड़ भी है। यह उदाहरण बताता है कि प्रदेशभर में डॉक्टरों के पंजीयन से लेकर अस्पतालों के संचालन तक गड़बड़ियों का बड़ा खेल चल रहा है, जिसमें स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत भी शामिल हो सकती है।
चिकित्सा जगत में इस खुलासे ने हड़कंप मचा दिया है। अगर आरटीआई के जरिए सामने आए इस मामले की पारदर्शी जांच नहीं हुई तो भविष्य में मरीजों की जान पर सीधा खतरा मंडरा सकता है। शासन और स्वास्थ्य विभाग पर अब यह जिम्मेदारी है कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई करे और अस्पताल पंजीकरण प्रणाली को पूर्णतः पारदर्शी बनाए।
फर्जी पंजीयन से अस्पताल संचालन, स्वास्थ्य विभाग पर सवाल