मोंथा तूफान से करइल की फसलें तबाह, किसानों की बर्बादी पर सरकार खामोश

मोहम्मदाबाद (Muhammadabad) क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला करइल इलाका, जिसे अन्न का भंडार कहा जाता है, इस वर्ष भयंकर प्राकृतिक आपदा की चपेट में आ गया। मोंथा तूफान (Cyclone Mountha) ने यहां की तैयार फसलों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। धान और बाजरे की फसलें जो कटाई के लिए तैयार थीं, वे तेज हवा और भारी वर्षा की मार से खेतों में ही चौपट हो गईं। इस आपदा ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया और उनकी आर्थिक स्थिति को गहरा झटका पहुंचाया।

मोंथा तूफान की तबाही से किसानों की हालत खराब:
करइल क्षेत्र के किसानों का कहना है कि इस बार की तबाही ने उनकी वर्षों की मेहनत पर पानी फेर दिया। खेतों में लगी फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं, जिससे किसानों की आय का मुख्य स्रोत खत्म हो गया है। भारी वर्षा और तूफानी हवाओं ने खेतों को जलमग्न कर दिया, जिससे अगली रबी फसल की बुआई भी अब लगभग असंभव लग रही है। कई किसानों ने बताया कि इस नुकसान से उबरने में उन्हें वर्षों लग जाएंगे।

रबी की बुआई पर संकट के बादल:
धान और बाजरे की फसलों के नष्ट होने के बाद अब रबी सीजन की बुआई पर भी संकट मंडरा रहा है। खेतों में जमा पानी और खराब मिट्टी की स्थिति ने किसानों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। करइल के कई किसानों का कहना है कि बीज और खाद के लिए उनके पास अब कोई संसाधन नहीं बचे हैं। बर्बाद फसलों ने न केवल वर्तमान आय छीन ली है बल्कि आने वाले सीजन के लिए भी अनिश्चितता पैदा कर दी है।

सरकारी मदद को लेकर किसानों में रोष:
किसानों का कहना है कि इतनी बड़ी तबाही के बाद भी प्रशासन या सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। खेतों में बर्बाद हुई फसलों का सर्वे तक नहीं हुआ, जिससे किसानों को मुआवजा मिलने की उम्मीद भी धुंधली पड़ती जा रही है। किसानों ने सरकार से मांग की है कि क्षेत्र का सर्वे तत्काल कराया जाए और उन्हें आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए ताकि वे रबी फसल की बुआई शुरू कर सकें।

कृषि क्षेत्र की उपेक्षा पर उठे सवाल:
करइल क्षेत्र, जिसे पूर्व में उपजाऊ भूमि के रूप में जाना जाता था, अब धीरे-धीरे संकटग्रस्त क्षेत्र बनता जा रहा है। बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं और सरकारी उदासीनता ने किसानों को हताश कर दिया है। क्षेत्र के किसानों का कहना है कि यदि जल्द ही प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो करइल की पहचान “अन्न का बखार” के रूप में केवल इतिहास बनकर रह जाएगी।


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डिस्क्लेमर: यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है।

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