सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: वक्फ संशोधन कानून के 3 प्रावधानों पर रोक



वक्फ (संशोधन) कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अहम अंतरिम आदेश सुनाया। कोर्ट ने साफ किया कि पूरे कानून पर रोक लगाने का आदेश नहीं दिया जा सकता, क्योंकि किसी कानून को रोकना केवल दुर्लभतम परिस्थितियों (रेयर ऑफ द रेयर) में ही संभव है। हालांकि, अदालत ने 3 संशोधनों पर रोक लगा दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। लेकिन, जहां तक संभव हो, पदेन सदस्य मुस्लिम ही होने चाहिए। इस मामले पर फैसला पहले सुरक्षित रखा गया था। पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने कानून को मुसलमानों के अधिकारों के खिलाफ बताते हुए अंतरिम रोक की मांग की थी, जबकि केंद्र सरकार ने इसे संवैधानिक करार दिया था।


पांच याचिकाओं पर हुई सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) कानून को चुनौती देने वाली पांच मुख्य याचिकाओं पर सुनवाई की। इनमें AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी की याचिका भी शामिल थी। चीफ जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने तीन दिनों तक लगातार बहस सुनी। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें दीं, जबकि याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और राजीव धवन ने पैरवी की।



तीन दिनों की सुनवाई का सिलसिला

22 मई: केंद्र की ओर से SG तुषार मेहता ने सेक्शन 3E का उल्लेख किया। उनका कहना था कि यह प्रावधान अनुसूचित क्षेत्रों में वक्फ निर्माण पर रोक लगाता है और इसका मकसद अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा है। वहीं, कपिल सिब्बल ने कहा कि नए कानून ने ऐतिहासिक और संवैधानिक सिद्धांतों को नजरअंदाज कर दिया है और सरकार गैर-न्यायिक प्रक्रिया से वक्फ संपत्तियों पर कब्जा करना चाहती है।

20 मई: कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को कहा कि अगर वे अंतरिम राहत चाहते हैं, तो उन्हें मजबूत और स्पष्ट दलीलें रखनी होंगी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जो संपत्तियां ASI (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के संरक्षण में हैं, वे वक्फ संपत्ति नहीं हो सकतीं।

21 मई: सुनवाई के दूसरे दिन केंद्र सरकार ने अपने पक्ष में दलीलें पेश कीं। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि वक्फ बाय यूजर कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह 1954 में बनाई गई एक विधायी नीति है जिसे संविधान के तहत वापस लिया जा सकता है।



कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी

केंद्र सरकार ने वक्फ (संशोधन) बिल, 2025 को अप्रैल में अधिसूचित किया। 5 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे मंजूरी दी। लोकसभा में यह बिल 288 मतों से पारित हुआ, जबकि 232 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया।



किन-किन ने दायर की याचिकाएं

इस कानून को चुनौती देने वालों में कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, AAP विधायक अमानतुल्लाह खान, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी शामिल हैं।


सुप्रीम कोर्ट में पिछली सुनवाईयां

15 मई: कोर्ट ने कहा था कि वह अंतरिम राहत पर विचार करेगा। केंद्र और याचिकाकर्ताओं से 19 मई तक हलफनामा मांगा गया था।

25 अप्रैल: केंद्र ने 1332 पन्नों का हलफनामा दायर किया जिसमें दावा किया गया कि 2013 से अब तक वक्फ संपत्तियों में 20 लाख एकड़ से अधिक का इजाफा हुआ है, जिससे निजी और सरकारी जमीनों पर विवाद बढ़ा।

17 अप्रैल: SG मेहता ने कहा था कि यह कानून लाखों सुझावों पर विचार के बाद बनाया गया है और संसद से पारित कानून पर रोक बिना उचित सुनवाई के नहीं लगाई जानी चाहिए।

16 अप्रैल: कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि सरकार कैसे यह तय कर सकती है कि केवल मुसलमान ही वक्फ बना सकते हैं और यह भी कि किसी व्यक्ति ने पिछले 5 साल से इस्लाम को माना है या नहीं। उन्होंने कहा कि राज्य को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह नागरिक की धार्मिक पहचान को इस प्रकार जांचे।



👉 इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह तो साफ कर दिया है कि पूरे कानून पर रोक नहीं लगेगी, लेकिन जिन तीन संशोधनों पर रोक लगाई गई है, उनका असर आने वाले दिनों में कानूनी और राजनीतिक बहस को और गहरा सकता है।

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