लखनऊ (Lucknow) स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय (Khwaja Moinuddin Chishti Language University) में जलवायु परिवर्तन एवं समाज विषय पर सातवीं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में जलवायु परिवर्तन के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर गहन चर्चा हुई। कार्यक्रम में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, मानव कल्याण, शांति और पर्यावरण नैतिकता जैसे विषयों को केंद्र में रखकर विचार-विमर्श किया गया। देश-विदेश से आए पर्यावरण प्रतिनिधियों और शिक्षाविदों ने अपने विचार साझा किए और वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों पर चिंता व्यक्त की।
अंतरराष्ट्रीय भागीदारी और व्यापक विमर्श:
सातवीं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की विशेषता इसकी वैश्विक भागीदारी रही। इस आयोजन में सात देशों और भारत के 28 राज्यों से आए पर्यावरण प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों ने जलवायु परिवर्तन से उपज रही समस्याओं, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सतत विकास के उपायों पर अपने सुझाव प्रस्तुत किए। संगोष्ठी के दौरान यह बात उभरकर सामने आई कि पर्यावरणीय संकट किसी एक क्षेत्र या देश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक चुनौती बन चुका है, जिसके समाधान के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।
मुख्य अतिथि का संबोधन और शिलान्यास कार्यक्रम:
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दया शंकर सिंह (Daya Shankar Singh) रहे। कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती वंदना के साथ की गई। इस अवसर पर विश्वविद्यालय परिसर में योग वाटिका के अंतर्गत प्रस्तावित प्रतिमाओं का शिलान्यास किया गया। यह शिलान्यास राज्यपाल आनंदीबेन पटेल (Anandiben Patel) की प्रेरणा से किया गया, जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों और समाज में प्रकृति व पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना बताया गया।
ग्लोबल वार्मिंग और खेती पर प्रभाव:
संगोष्ठी के दौरान ग्लोबल वार्मिंग के कारण खेती को हो रहे नुकसान पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने बताया कि तापमान में निरंतर वृद्धि, अनियमित वर्षा और मौसम चक्र में बदलाव से कृषि उत्पादन पर गंभीर असर पड़ रहा है। इस नुकसान को किस प्रकार कम किया जा सकता है, इस पर भी विचार रखे गए। विशेषज्ञों ने टिकाऊ कृषि पद्धतियों, जल संरक्षण और पर्यावरण अनुकूल तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया।
कुलपति के विचार और सुझाव:
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अजय तनेजा (Ajay Taneja) ने संगोष्ठी के माध्यम से पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऐसी संगोष्ठियां केवल अकादमिक चर्चा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इनके निष्कर्षों और सुझावों को सरकार तक पहुंचाया जाना चाहिए, ताकि नीति निर्माण में उनका उपयोग हो सके। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए शिक्षा, शोध और जनभागीदारी को जरूरी बताया।
प्रदूषण के खिलाफ सरकारी प्रयासों पर चर्चा:
मुख्य अतिथि दया शंकर सिंह ने अपने संबोधन में पर्यावरण से हो रहे नुकसान पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के नेतृत्व में प्रदूषण के खिलाफ व्यापक स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। परिवहन क्षेत्र में सुधार को इसका महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया।
इलेक्ट्रिक बसों की पहल:
कार्यक्रम में यह भी जानकारी दी गई कि प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश के 43 जिलों में इलेक्ट्रिक बसों का संचालन परिवहन विभाग द्वारा शुरू किया गया है। वक्ता के अनुसार, दूसरे चरण में राज्य के सभी जिलों में डीजल से चलने वाली बसों को हटाने की योजना है और उनकी जगह इलेक्ट्रिक बसों का संचालन शुरू किया जाएगा। इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम बताया गया।
संगोष्ठी का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में शिक्षा, नीति और व्यवहार तीनों स्तरों पर ठोस प्रयास किए जाएंगे।
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