उत्तर प्रदेश में सोशल मीडिया और सार्वजनिक जीवन में जाति आधारित संदेश और महिमामंडन अब निषिद्ध होगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फेसबुक, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जाति की प्रशंसा करने वाली सामग्री पर कड़ी निगरानी की जाएगी और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी।
वाहनों से जाति चिन्ह हटाना अनिवार्य
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, गाड़ियों पर लिखे जातिगत नाम या प्रतीक जैसे ठाकुर, यादव, ब्राह्मण आदि अब नहीं रहेंगे। मोटर वाहन नियमों में संशोधन कर निजी और सार्वजनिक वाहनों से जाति पहचान के चिन्ह और नारे हटाने का निर्देश दिया गया है। यह कदम समाज में जातीय विभाजन को कम करने और समानता की भावना को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उठाया गया है।
पुलिस दस्तावेजों में बदलाव
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि एफआईआर, रिकवरी मेमो, गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण मेमो, पुलिस की फाइनल रिपोर्ट और थानों के नोटिस बोर्ड से जातिगत कॉलम हटाए जाएं। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने कहा कि जाति लिखना कानूनी जांच के लिए अनावश्यक है और यह पूर्वाग्रह को बढ़ावा देता है।
जातिगत महिमामंडन राष्ट्र विरोधी
पीठ ने जातिगत महिमामंडन को राष्ट्र विरोधी बताया और कहा कि वंश या जाति के बजाय संविधान और राष्ट्रीय सेवा के प्रति श्रद्धा ही असली देशभक्ति है। न्यायालय ने चेतावनी दी कि समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी जाति व्यवस्था को मिटाना जरूरी है ताकि 2047 तक भारत एक विकसित राष्ट्र बन सके।
संवैधानिक नैतिकता और मौलिक अधिकार
हाईकोर्ट ने यह भी बताया कि किसी व्यक्ति की जाति को पहचान का आधार बनाना जनमत और न्यायिक सोच को प्रभावित करता है। यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन और संवैधानिक नैतिकता को कमजोर करता है। पीठ ने रजिस्ट्रार को निर्देश दिए कि इस फैसले की कॉपी उत्तर प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी को भेजी जाए, जो इसे मुख्यमंत्री, केंद्रीय गृह सचिव, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय और भारतीय प्रेस परिषद के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।
अब सवाल यह है
अब यह देखना होगा कि उत्तर प्रदेश में जातीय आधार पर राजनीति करने वाले दल, संगठन, नेता, एक्टिविस्ट, सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर और आम लोग हाईकोर्ट के इन निर्देशों का कितना पालन करेंगे। यह आदेश न केवल प्रशासनिक बल्कि समाजिक स्तर पर भी बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।