बरेली। बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) द्वारा किसानों की जमीन अधिग्रहित किए जाने के बावजूद मुआवजा न मिलने का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। रामगंगानगर आवासीय योजना के लिए वर्ष 2004 में किसानों की जमीन ली गई थी, लेकिन आज भी कई किसान न्याय के लिए भटक रहे हैं। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।
जानकारी के अनुसार, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण (लारा) और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही किसानों को मुआवजा देने का आदेश पारित किया, लेकिन बीडीए आदेश का पालन नहीं कर रहा। बिसौली तहसील के चंद्रपुरा बिचपुरी गांव के किसानों के मामले में बीडीए को 114.13 करोड़ रुपये भुगतान करना था। इसमें 29.75 करोड़ मूलधन और शेष ब्याज शामिल है। ब्याज की दर इतनी है कि प्रतिदिन लगभग 1.22 लाख रुपये बढ़ते जा रहे हैं।
लारा ने तीन माह के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया था। इसके बावजूद बीडीए राशि जमा नहीं कर पाया। इसी तरह आंवला तहसील के महेंद्र कुमार और रामप्रकाश की जमीन का भी अधिग्रहण किया गया था। इसमें भी मूलधन 3.26 करोड़ और ब्याज समेत कुल 12.57 करोड़ रुपये का भुगतान होना था।
कोर्ट ने दोनों मामलों में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पूरी राशि ब्याज सहित किसानों को लौटाई जाए, लेकिन अब तक बीडीए एक रुपया भी जमा नहीं कर पाया है। किसानों का कहना है कि उन्हें जमीन दिए 20 साल हो चुके हैं और अब तक उन्हें उनका हक नहीं मिला।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही आदेशों का पालन नहीं हुआ तो ब्याज का बोझ और बढ़ता जाएगा। इससे न केवल किसानों का हक़ मारा जाएगा बल्कि सरकारी तिजोरी पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि आदेश का पालन न करना अदालत की अवमानना होगी।
यह मामला इस बात का उदाहरण है कि प्रशासनिक लापरवाही कैसे किसानों के हक और न्याय में वर्षों की देरी कर रही है।
20 साल बाद भी मुआवजे से वंचित किसान, बीडीए ने दबाए 114 करोड़!