खुशियाँ बाँट दी सबको, पर खुद की हसरतें अभी राख हैं.
दिल तवायफ बन गया है, पर जिस्म अभी भी पाक है..
ये रिपोर्ट शायद इस शायरी को चरितार्थ कर दें यूँ तो तवायफों की कहानियां कई है और दर्द भरी भी हैं. फिल्मों में तवायफों के कई रूप दिखाए गयें और उन तस्वीरों को देखकर शायद समाज ने भी अपने हिसाब से तवायफों की परिभाषा गढ़ ली. संजाज कि अजीब दास्तां है किसी महिला ने यदि पहले पुरुष से सम्बन्ध तोड़ दुसरे पुरुष से सम्बन्ध बना लिया तो वो समाज के पैमाने में गलत हो गई और यदि कोई पुरुष एक से ज्यादा महिलाओं से सम्बन्ध में रहे तो वो उसका अधिकार हो गया. खैर बदलते जमाने के साथ समाज की सोच भी बदल रही है और बदलनी भी चाहिए क्योंकि असली आज़ादी इसी में है की न हम किसी के गुलाम बने और न ही हमारा गुलाम कोई बने.
लेकिन आज भी हमारे समाज में कानूनन और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कई गैर सामाजिक प्रथाएं हैं पर जो उनका पालन करने वालों हैं उनके लिए सामाजिक हैं. ऊँची जाती निची जाति का भेद भाव, गरीब असहायों को दबाना और उन्हें प्रताड़ित करना, महिलाओं के विकास को रोकना, पुरुष प्रधान समाज को बढ़ावा देना, आज भी आपको गाँव और छोटे शहरों में स्पष्ट रूप से देखने को मिल जायेगा. आश्चर्य कि बात ये है कि ये सब वहीँ लोग करते हुए दिख जायेंगें जिन्हें समाज का बुद्धिजीवी वर्ग कहते हैं.
आज भी लोगों को ये जानने में ज्यादा रूचि होती है कि एक महिला और पुरुष में क्या सम्बन्ध है? आज भी समाज का एक वर्ग ऐसा है जो सेक्स वर्कर को हीन भावना से देखते हैं और सड़क पर लड़कियों को छेड़ने वालों और दुष्कर्म करने वालो का पक्ष लेते हैं. खैर देश उनकी इस विचारधारों से नहीं चलता. जरुरत है मजबूत लोगों द्वारा देश के सविधान और कानून का पालन करवाने की, क्योंकि कमजोरों को तो ये तथाकथित सामाजिक लोग बोलने नहीं देंगें.
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि वेश्यावृत्ति भी एक प्रोफेशन है, ऐसे में अपनी मर्जी से पेशा अपनाने वाले सेक्स वर्कर्स को सम्मानीय जीवन जीने का हक है, इसलिए पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई न करे। शीर्ष अदालत ने इस मामले को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के साथ पुलिस को भी कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का मतलब है कि अब पुलिस सेक्स वर्कर्स के काम में साधारण परिस्थितियों में बाधा नहीं डाल सकती है।
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लेकिन क्या उत्तर प्रदेश के जनपद गाजीपुर का बसुका आज नए भारत के साथ चल रहा है? जी हाँ उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के गहमर थाना क्षेत्र में बसुका गांव के बाहरी हिस्से में एक बस्ती है, जो कभी तवायफों के लिए विख्यात थी. आजादी के बाद राजशाही खत्म हुई, गणतंत्र आया और इसके साथ ही मुजरा कल्चर खत्म होने के बाद में इस जगह को जिस्मफरोशी की वजह से भी जाना गया. यूपी के बनारस से लेकर बिहार के पटना के बीच ये गांव इन दो वजहों से मशहूर रहा है. जिस्मफरोशी के खरीददार छुपे हुए हैं और ये निजी मामला है. लेकिन इन दो बड़े पुराने शहरों के बीच इस गांव को बाद में भी शादी-विवाह और आर्केस्ट्रा में ‘नाचनेवाली लड़कियों’ के पोषक के रूप में सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है. पर अब बसुका गांव का ये हिस्सा तवायफ कल्चर से बाहर निकलकर नए इंडिया का हिस्सा बनना चाहता है. टिकटॉक और वॉट्सऐप के मैसेज यहां भी पहुंच चुके हैं. साथ ही पहुंचा है पंचायती राज, जिसने यहां का सामाजिक नक्शा बदल दिया है. तीन तलाक के खिलाफ बिल आने के बाद यहां की औरतों को मोदी सरकार से अपेक्षाएं हो गई हैं. यहां की मुस्लिम औरतों के मुताबिक उन्होंने लोकसभा चुनाव में भाजपा को ही वोट दिया था, क्योंकि पिछले दो वर्षों में गांव की सड़क बन गई थी.
गाजीपुर के ही एक दूसरे गांव के लोग इस गांव के इतिहास को मुंह जबानी चली आ रही कहानियों के मार्फत जानते हैं. ये कहानियां कई पीढ़ी पुरानी हैं. खंडहर हो चुके घर, नालियों से बाहर बह रहा गंदा पानी और टूटी गलियों से बने इस गांव में 2019 के एक रिपोर्ट के अनुसार करीब 6500 वोट हैं. जिसमें से 1500 के करीब अगड़ी जातियों के लोग हैं. बाकी वोटर्स में हिंदुओं की पिछड़ी जातियां और मुसलमान हैं.
एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘बड़ी जातियों ने मुसलमानों को कर्ज में डुबोए रखने के लिए इनकी बेटियों को इस धंधे में धकेला. ये सब पुलिस की नाक के नीचे होता था. ब्याज बहुत ज्यादा होता है और ये पैसा बहुत बढ़ जाता था. शादी-ब्याह के सीजन में नाचकर और जिस्म फरोशी करके इन घरों की महिलाएं ये कर्जा उतारतीं. ये पेशा करवाते. कोई इस कुचक्र से कैसे निकलता. ना इनके पास जमीनें थीं और ना ही आजीविका के साधन. गांव की जमीनें बड़ी जातियों की थी. वर्चस्व बनाए रखने के लिए बेटियों से ये धंधा करवाया गया.’
वहीँ बड़ी जाति के एक व्यक्ति का कहना है कि ‘किसी ने किसी को जबरदस्ती धंधे में नहीं धकेला. किसी को पता नहीं कि कब कैसे क्या शुरू हुआ. कई कहानियां हैं. हां, ये जरूर है कि गरीब आदमी फंस जाए तो उसे बेटी से पेशा करवाना आसान रास्ता मालूम पड़ता है. फंस जाने पर समाज निकलने नहीं देता. अब थोड़ा बदल रहा है. पर ये नहीं कह सकते कि सारे लोग लड़कियों को फंसाना ही चाहते हैं. अगर चुनावी राजनीति की बात करें तो सबके अपने अपने लक्ष्य हैं, इसमें अगड़ी जातियां हारना तो नहीं ही चाहेंगी.’
खैर बसुका की कई कहानियां है लेकिन अब एक बार फिर बसुका के नृत्य करने वाली महिलाओं का संघर्ष शुरू हो चूका है और ये संघर्ष दबंगों के खिलाफ है जिसकी लड़ाई अब एसडीएम कार्यालय तक पहुँच गई.
विगत दिनों गहमर थाना क्षेत्र के बसुका गांव में रहने वाली नृत्य संगीत का पेशा करने वाली महिलाएं गहमर थाने पहुंचीं. उन्होंने अपने ही गांव के ग्राम प्रधान एवं एक मौलाना सहित दर्जनों लोगों पर छेड़खानी करने एवं रंगदारी मांगने का तहरीर दी थी. उन्होंने आरोप लगाया की सैकड़ों साल से चली आ रही पुस्तैनी नृत्य-संगीत परंपरा को बंद करने का प्रयास किया जा रहा है.उनका कहना था नृत्य कला ही उनके आजीविका का एकमात्र साधन है. इसके बंद हो जाने से वह भूखमरी के कगार पर आ जाएंगे.
दरअसल इन महिलाओं पर सेक्स रैकेट चलने का आरोप लगा था लेकिन सवाल ये है कि जब आरोप सेक्स रैकेट चलने का है तो ग्राम प्रधान द्वारा रंगदारी क्यों मांगी गई और सेक्स वर्कर पर आप पाबन्दी कैसे लगा सकते हैं जब स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने इसको गुनाह नहीं माना. कोई ग्राम प्रधान सुप्रीम कोर्ट से ऊपर हो नहीं सकता. खैर मामला सेक्स रैकेट का नहीं नृत संगीत का निकला.
बीते शुक्रवार को दोनों पक्षो को सेवराई के एसडीएम राजेश प्रसाद ने बुलाया था. जहां उन्होंने उन औरतों के कागजात देखे और गलत काम न करने की बात कहते हुए नृत्य संगीत के रजिस्ट्रेशन अनुसार कार्य करने की अनुमति दे दी.
उस समय सम्बंधित थाने के पुलिस अधिकारी भी मौजूद रहे. सेवराई तहसील क्षेत्र के बसुका गांव में सैकड़ों वर्ष पुरानी चली आ रही नृत्य-संगीत कला की परंपरा को दोबारा चालू करने का निर्देश दे दिया. अब एक फिर ढोलक की थाप और घुंघरू की झंकार के बीच नृत्य और संगीत का लुफ्त कला प्रेमी उठा सकते हैं.
इस मामले में एसडीएम राजेश प्रसाद ने जानकारी दी. उन्होंने बताया कि नृत्य-सगीत के लिए उनके पास वैधानिक लाइसेंस है. इसके जरिये वे अपना कार्य कर सकती है, जो भी अनावश्यक रूप से अराजक तत्व इसमें व्यवधान उत्पन्न करेगा, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जायेगी.
सवाल सेक्स वर्क करना या किसी से शारीरिक सम्बन्ध बनाने का है तो ये उस काम करने वाले की अपनी स्वतंत्रता है, कोई एनी उनके निजिता का हनन नहीं कर सकता. ये तब तक गैर कानूनी नहीं है जब तक इसमें जबरदस्ती या अन्य अपराध ना हो.
समाज की पहली प्राथमिकता इस देश बलात्कार जैसे अपराध को जड़ से ख़त्म करने की होनी चाहिए… विचार कीजियेगा