मनुस्मृति आधार पर फांसी, कांग्रेस सचिव शाहनवाज आलम ने जज को बर्खास्त करने की मांग की!

रिपोर्टर: अनुज कुमार

13 अक्टूबर 2024 को उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बहराइच (Bahraich) में हुई सांप्रदायिक हिंसा के दौरान रामगोपाल मिश्रा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में बहराइच जिला न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कुल 10 आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई, जिसमें एक आरोपी सरफराज को फांसी और नौ अन्य दोषियों को आजीवन कारावास की सजा दी गई है। फैसले के बाद जहां पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने की बात कही जा रही है, वहीं फैसले में एक विशेष संदर्भ को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।

कोर्ट के फैसले में मनुस्मृति का संदर्भ:
बहराइच जिला कोर्ट के इस निर्णय में न्यायाधीश पवन कुमार शर्मा (Pawan Kumar Sharma) ने सजा सुनाते समय मनुस्मृति के एक अश्लोक का उल्लेख किया। इसी संदर्भ को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल उठने लगे हैं। फैसले में दोषियों को कड़ी सजा दिए जाने के बावजूद, धार्मिक ग्रंथ के उल्लेख को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

रामगोपाल मिश्रा हत्याकांड का मामला:
रामगोपाल मिश्रा की हत्या 13 अक्टूबर 2024 को बहराइच में हुई सांप्रदायिक हिंसा के दौरान हुई थी। इस घटना ने पूरे इलाके में तनाव और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया था। पुलिस जांच और अदालती प्रक्रिया के बाद मामले में कुल 10 लोगों को दोषी ठहराया गया। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आरोपियों को दोषसिद्ध माना।

सरफराज को फांसी, नौ को आजीवन कारावास:
अदालत के फैसले के अनुसार, मुख्य आरोपी सरफराज को मौत की सजा सुनाई गई है। वहीं अन्य नौ दोषियों को आजीवन कारावास की सजा दी गई। कोर्ट का कहना है कि यह अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति का है और समाज पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है, इसलिए सख्त सजा आवश्यक थी।

मनुस्मृति को लेकर उठे सवाल:
फैसले में मनुस्मृति के अश्लोक के इस्तेमाल को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मनुस्मृति को लेकर यह धारणा रही है कि यह एक विवादित ग्रंथ है, जिसे दलित विरोधी और महिला विरोधी माना जाता है। इसी वजह से न्यायिक निर्णय में इसके उल्लेख पर आपत्ति जताई जा रही है। कई लोगों का कहना है कि आधुनिक भारतीय न्याय व्यवस्था संविधान और कानून पर आधारित है, न कि प्राचीन धार्मिक ग्रंथों पर।

कांग्रेस का विरोध और मांग:
कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज आलम (Shahnawaz Alam) ने इस फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने न्यायाधीश पवन कुमार शर्मा द्वारा मनुस्मृति के अश्लोक के इस्तेमाल पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि इस तरह के विचार संविधान की भावना के विपरीत हैं और इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की अपील:
शाहनवाज आलम ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से मांग की है कि इस विचारधारा से जुड़े सभी न्यायाधीशों को बर्खास्त किया जाए। उनका कहना है कि देश का न्याय संविधान के तहत चलता है और किसी भी फैसले में विवादित धार्मिक ग्रंथों का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने इसे न्यायिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया:
इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसे पीड़ित परिवार के लिए न्याय की जीत बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग फैसले में दिए गए संदर्भ को अनुचित ठहरा रहे हैं। सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों की ओर से भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

कानून और संविधान की बहस:
यह मामला अब सिर्फ एक आपराधिक फैसले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह संविधान, कानून और न्यायिक प्रक्रिया की व्याख्या को लेकर व्यापक बहस का विषय बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में इस फैसले पर उच्च न्यायालयों में भी चर्चा हो सकती है।

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